10 अगस्त, 2017 को संसद भवन, नई दिल्ली में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति और राज्य सभा के सभापति श्री मो. हामिद अंसारी द्वारा दिया गया विदाई भाषण

New Delhi | अगस्त 10, 2017

मुझ पे इल्जाम इतने लगाए गए
बेगुनाही के अंदाज़ जाते रहे

किसी व्यक्ति के जीवन में एक दशक का समय काफी लंबा समय होता है। इस आरंभिक अवस्था में इस पर चिंतन करना आसान मगर अविवेकपूर्ण होगा। पूर्ववर्ती वक्ताओं के सुवचन और उनकी भावनाओं की उदारता अतुलनीय रहनी चाहिए; यदि मैं इसकी गहनता को नहीं जान पाया तो मैं बेअदब हो जाऊँगा। मैं सभी को अलग-अलग और सामूहिक रूप से धन्यवाद देता हूँ।

जब दस वर्ष पूर्व इस सभा में मेरा स्वागत किया गया था, उस समय एक विख्यात नेता, जो इस समय इस संसार में नहीं हैं, ने मुझे सलाह दी थी: उन्होंने कहा था 'कल के बाद आपको बहुत तकलीफ होगी, मुझे आपसे हमदर्दी है कि इस तकलीफ को आप झेल जाएं और एक सलाह भी है कि हम लोग कितना भी हल्ला करें आप अपने चेहरे पर गुस्सा मत दिखाइए और हमेशा हँसते रहिएगा ... हम सबके सब लोग देश के दुश्मन नहीं हैं लेकिन हम सब एक मुस्कान पर फ़िदा हो जाते हैं और चुपचाप बैठ जाते हैं।'

मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ कि मुझे उत्कृष्ट रूप से दी गई इस संवेदनशील सलाह का लाभ उठाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। इन सालों में मैंने इस कहावत की वैधता को खोजा है कि मित्र बनने की इच्छा करना शीघ्र होने वाला कार्य है किन्तु मित्रता का फल धीरे-धीरे ही परिपक्व होता है। इसको पोषित करने की आवश्यकता होती है।

मैं यह सोचने का साहस कर सकता हूँ कि मैं इसमें उचित तरह से सफल रहा हूँ।

यह पीठ क्रिकेट के मैदान में एक अंपायर और हॉकी के मैच में एक रेफरी की तरह होती है जो खेले जा रहे खेल और एक खिलाड़ी हुए बिना खिलाड़ियों पर नजर रखता है। उसका एक मात्र संदर्भ स्रोत नियम पुस्तिका होती है।

यह सभा संविधान की रचना है और यह संस्थापकों की बुद्धिमत्ता और दूरदृष्टि को परिलक्षित करती है जिन्होंने यह इच्छा प्रकट की थी कि यह भारत की विविधता का आईना बने और बिना सोचे समझे बनाए जाने वाले विधानों पर एक निवारक बने। इस सभा ने प्रजातंत्र के इस पवित्र स्वीकृत मत को कायम रखा है कि कार्य करने के मार्ग में एक बाधा बनने के बजाय चर्चा करना वास्तव में अपरिहार्य विवेकपूर्ण कार्य है। इस सुनहरे नियम से हट कर चलने से न तो सतत नीति निर्माण में योगदान मिलेगा और न ही हम स्वयं को विधि सम्मत शासन पर आधारित परिपक्व प्रजातांत्रिक देश होने का दावा कर पाएंगे।

इस परिप्रेक्ष्य में, जैसा कि मैने अगस्त, 2012 में किया था, मैं अपने अति विशिष्ट पूर्ववर्ती डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के इन शब्दों की पुन: याद दिलाना चाहूँगा :
प्रजातंत्र इस मायने में विलक्षण है कि यह अल्पसंख्यकों को संरक्षण प्रदान करता है। यदि प्रतिपक्षी दलों को सरकार की नीतियों की निष्पक्ष रूप से, स्वतंत्रतापूर्वक तथा स्पष्ट रूप से आलोचना करने की अनुमति नहीं दी जाए तो प्रजातंत्र का क्ष्ा रण होने की संभावना बनी रहेगी। किन्तु इसके साथ-साथ अल्पसंख्यकों की भी अपनी जिम्मदारियाँ होती हैं। जब उन्हें आलोचना करने के सभी अधिकार प्राप्त हैं, आलोचना करने के उनके अधिकार को संसद के कार्य में जानबूझ कर रूकावट डालकर और बाधा पहुँचाकर कम नहीं किया जाना चाहिए। अत: सभी समूहों के अपने अधिकार और अपने दायित्व हैं।

मैं उत्साहजनक ढंग से यह आशा करता हूँ कि इस सभा के सभी वर्ग इस सराहनीय उद्देश्य को हासिल करेंगे। जिस तरह से वे अपने कार्य करते हैं उसे प्रत्येक नागरिक अपनी मर्मज्ञपूर्ण आंखों से देखता है।

अब जब मैं इस पीठ को छोड़ रहा हूँ, मैं राज्य सभा को भली भांति कार्य करने की शुभकामनाएं देता हूँ। मैं इसके सदस्यों को सौंपे गए दायित्वों के लिए उनकी सफलता की कामना करता हूँ। मैं महासचिव, श्री शमशेर शरीफ और राज्य सभा सचिवालय के अधिकारियों को उनके द्वारा अनुकरणीय तरीके से अपने-अपने दायित्वों का निर्वहन करने के लिए धन्यवाद देता हूँ।

विदाई के इस अवसर पर उर्दू की ये दो पंक्तियां शायद उपयुक्त रहेंगी :

आओ कि आज खत्म हुई दास्तान-ए-इश्क
अब खत्म-ए-आशिकी के फसाने सुनाएं हम

जय हिंद।