16 फरवरी, 2013 को तिरुवनंतपुरम में मौलवी स्मारक व्याख्यान के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति द्वारा दिया गया अभिभाषण

तिरुवनंतपुरम | फ़रवरी 16, 2013

आज वक्कोम मौलवी स्मारक व्याख्यान देने तथा केरल के सराहनीय सामाजिक-आर्थिक विकास के पीछे रहे कुछ प्रमुख नायकों को सम्मानित करने हेतु यहां उपस्थित होकर मुझे बहुत खुशी हो रही है।

मित्रों, आज हम यहां पर वक्कोम मौलवी के रूप में लोकप्रिय वक्कोम मोहम्मद अब्दुल खादर की 140वीं जयंती मनाने के लिए एकत्र हुए हैं, जो केरल के पुनर्जागरण के प्रमुख सदस्य थे।

साथ ही, हम वक्कोम मौलवी फाउण्डेशन ट्रस्ट की रजत जयंती मना रहे हैं और वक्कोम मौलवी फाउण्डेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रोफेसर एन.ए. करीम के जीवन और कार्यों को सम्मानित कर रहे हैं, जिनके नाम पर फाउण्डेशन ने उत्कृष्ट सार्वजनिक सेवा के लिए पुरस्कार शुरू किया है और जिसे आज एक प्रसिद्ध गांधीवादी श्री पी.वी.राजगोपाल को दिया जा रहा है, जिन्होंने जनजातीय लोगों एवं समाज के अन्य उपेक्षित वर्गों के कल्याण के लिए अथक रूप से कार्य किया है।

19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध और 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के बीच केरल के पुनरूत्थान में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले प्रसिद्ध लोगों में वक्कोम अब्दुल खादर मौलवी अग्रणी स्थान रखते हैं। इस पुनर्जागरण के नेताओं ने दासत्व के दो रूपों के विरूद्ध पुरजोर संघर्ष किया : पहला दमनकारी राजनीतिक संस्थानों के विरूद्ध, जिन्होंने लोगों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा और दूसरा दमनात्मक सामाजिक रीति-रिवाजों के विरूद्ध, जिन्होंने उन्हें उनकी सामाजिक स्वतंत्रता से वंचित रखा।

मूलभूत राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक अधिकारों के लिए यह संघर्ष केरल के पुनरुद्धार का प्रमाण-चिह्र था और आधुनिक भारत में इसके बाद के सामाजिक और आर्थिक विकास के मुख्य कारणों में से एक था।

उस समय ट्रावनकोर में मुस्लिम समुदाय के अधिकांश लोगों, जो मुख्यतया व्यापार या खेती-बाड़ी में लगे थे, से भिन्न वक्कोम मौलवी अपनी खुद की कोशिशों से एक बड़े विद्वान और भाषाविद् के रूप में उभरे। उन्होंने पश्चिम के अग्रणी रचनाकारों की रचनाओं को पढ़ा और मिस्र में इस्लामी पुनर्जागरण के नेताओं से पत्राचार किया।

इससे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह मानते थे कि ज्ञान केवल सिद्धांत के दायरे में रखे रहने के लिए नहीं होता है, बल्कि यह क्रिया का उत्प्रेरक होता है।

वक्कोम मौलवी फाउंडेशन ट्रस्ट ज्ञान और कार्य के माध्यम से लोगों का चरित्र निर्माण करने, सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने और वंचित लोगों की समस्याओं का समाधान करने के लक्ष्य के साथ स्थापित किया गया था। इनमें से प्रत्येक उद्देश्य आज के भारतीय समाज के लिए भी प्रासंगिक है।

कहा जाता है कि आत्मविश्लेषण क्रिया को प्रोत्साहित करता है। जब हमने 26 जनवरी, 1950 को अपना संविधान अपनाया था, तब हमने समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए; और व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प किया था ।

तिरसठ वर्ष बाद, हमें यह आकलन करने की आवश्यकता है कि हमने किस हद तक इन लक्ष्यों को प्राप्त किया है।

मैं संविधान सभा में डा. बी.आर. अम्बेडकर द्वारा कहे गए शब्दों को याद करना चाहूंगाः

"26 जनवरी, 1950 को हम एक विरोधाभासपूर्ण जीवन में प्रवेश कर रहे हैं। राजनीति में हमें समता मिलेगी पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में हमें असमानता मिलेगी। राजनीति में हम एक व्यक्ति एक वोट और एक वोट एक मूल्य के सिद्धांत को मान्यता देंगे। अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम अपनी सामाजिक और आर्थिक संरचना के कारण एक व्यक्ति एक मूल्य के सिद्धांत को खारिज करते रहेंगे। आख़िर कब तक हम इस विरोधाभासपूर्ण जीवन को जीते रहेंगे? आखिर कब तक हम सामाजिक-आर्थिक जीवन में समता को खारिज करते रहेंगे? यदि हम लंबे समय तक समता को नहीं स्वीकारेंगे, तो हमारा राजनीतिक लोकतंत्र भी लंबे समय तक कायम नहीं रह पायेगा।"

उन्होंने आगे कहा कि "हमें इस विरोधाभास को यथाशीघ्र दूर करना चाहिए अन्यथा जो लोग असमानता का सामना कर रहे हैं वे लोकतंत्र के ढांचे को नष्ट कर देंगे जिसे इस संविधान सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है।"

हम इस विरोधाभास को दूर करने में कितना सफल हुए हैं?

यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि हमने राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हमारे समक्ष मौजूद चुनौतियों की गम्भीरता के संदर्भ में इसका महत्व और भी बढ़ जाता है।

अपनी व्यापक विविधता के बावजूद, भारत अपने संघीय ढांचे और स्वतंत्र न्यायपालिका सहित एक जीवंत और सुदृढ़ बहुदलीय संसदीय लोकतंत्र के रूप में उभरा है। नियमित रूप से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए जाते हैं जिनमें लोग अपनी इच्छानुसार अपनी सरकारें चुनते हैं। भारतीय चुनाव प्रक्रिया की कुशलता को इसकी व्यापक और जटिलता के मद्देनजर विश्वभर में आश्चर्य से देखा जाता है।

भारतीय राजनीतिक प्रणाली में विविधता को समाहित करने और ऐतिहासिक नाइंसाफियों को सुधारने के उद्देश्य से रखी गई व्यवस्था मौजूद हैं जिनमें हमारे समाज में विभिन्न समूहों के अधिकारों को मान्यता देना और बढ़ावा देना शामिल है। पंचायती राज प्रणाली के परिपक्व होने तथा हमारी राजनीतिक व्यवस्था में गहरी पैठ बनाने के साथ ही लोकतंत्र ने आधारभूत स्तर पर जड़ें जमा ली हैं।

क्रय शक्ति समानता की दृष्टि से हमारी अर्थव्यवस्था विश्व में तीसरी या चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है। हमारी अर्थव्यवस्था न्यून विकास दर से उच्च विकास दर की अर्थव्यवस्था; कम खाद्यान्न और विदेशी मुद्रा वाली अर्थव्यवस्था से इनकी अधिकता वाली अर्थव्यवस्था तथा कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से सेवा-उन्मुखी अर्थव्यवस्था बन गई है। हम सहायता प्रदान करने वाले देशों के क्लब में शामिल हो गए हैं। अब हम ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था के रूप में उभरने की प्रक्रिया में हैं।

वैश्विक आर्थिक और वित्तीय संकट और इसके फलस्वरूप विकास दर में आई मंदी के बावजूद, भारत अभी भी सबसे तेजी से विकसित होती हुई अर्थव्यवस्थाओं के बीच बना हुआ है। हरित क्रांति और तदुपरांत कृषि अनुसंधान और विकास की बदौलत खाद्यान्न की कमी और अकाल अतीत की केवल दुखद यादें भर रह गईं हैं।

चिकित्सकों और इंजीनियरों सहित विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में हमारे प्रशिक्षित मानव संसाधान एक बहुत बड़ी आस्ति हैं। अनुसंधान के अग्रणी क्षेत्रों जैसे कि अंतरिक्ष, नाभिकीय, जैव-प्रौद्योगिकी, अतिसूक्ष्म प्रौद्योगिकी और सूचना प्रौद्योगिकी में हमारी प्रगति सराहनीय है।

सामाजिक-आर्थिक मानदंडों की दृष्टि से, गरीबी, बेरोजगारी, असमानता, निरक्षरता, स्वास्थ्य, कुपोषण, आवास आदि के सूचकांकों में काफी सुधार हुआ है। 'निराशाजनक क्षेत्र' कही जाने वाली अर्थव्यवस्था से, अब हमें विश्व की सबसे तेजी से विकसित होती हुई अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है।

सकारात्मक कार्यवाही अथवा सकारात्मक भेदभाव से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यकों सहित समाज के पारम्परिक रूप से वंचित और अधिकारहीन वर्गों की दशा सुधरी है। संविधान में कानून के समक्ष समानता और अवसर की समानता की गारंटी दी गई है। लिंग, जाति, धर्म, संप्रदाय अथवा भाषा के आधार पर भेदभाव कानून के अन्तर्गत अवैध और दंडनीय है।

इन कदमों के द्वारा हमारे लोकतंत्र और समाज को राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से और अधिक समतावादी बनाने के लिए पूर्वापेक्षाएं स्थापित कर दी गई है, जैसा कि हमारे देश के निर्माताओं द्वारा कल्पना की गई थी।

इन उपलब्धियों के बावजूद हमारा राष्ट्र-निर्माण का कार्य अभी पूरा किया जाना है और अभी भी हमारे सामने विकट चुनौतियां हैं।

हमे ऐसी ताकतों की ओर से हिंसा का सामना करना पड़ रहा है राज्य के संवैधानिक ढांचे के प्रादेश को चुनौती दे रही हैं। ऐसी अन्य ताकतें भी हैं जो जाति, धर्म नस्ल, भाषा और क्षेत्रवाद से उत्पन्न संकीर्ण पहचान के आधार पर हमारे समाज की खामियों का लाभ उठाती है। सार्वजनिक जीवन में सत्यनिष्ठा के गिरते मानकों से हमारे गणतंत्र की आधारभूत संरचना को ही खतरा उत्पन्न हो रहा है।

गरीबी, असमानता और बेरोजगारी हमारी विकास संबंधी महत्वाकांक्षाओं में प्रमुख बाधाएं हैं। विगत छह दशकों की उपलब्धियों के बावजूद, वर्ष 2009-2010 में 354.60 मिलियन की जनसंख्या में से अनुमानत: 29.8 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे रह रहे थे। दूसरी ओर, आय समूहों के शीर्ष 10 प्रतिशत लोगों का 33 प्रतिशत आय पर हक है।

यद्यपि बेरोजगारी संबंधी आधिकारिक आंकड़े बहुत कम प्रतीत होते हैं, व्यापक अल्प रोजगार और उत्पादकता में कमी, विशेषकर अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक क्षेत्र, जहां 90 प्रतिशत कार्यबल नियोजित है, की बिगड़ती स्थिति वास्तविक चुनौती है।

निरक्षरता, बीमारी, कुपोषण, शिशु मृत्यु-दर, गिरता बाल लिंग अनुपात, आवासहीनता और बहुत से अन्य सामाजिक-आर्थिक सूचकांकों संबंधी राष्ट्रीय आंकड़े दिलासा देने वाले नहीं हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, हमारी 26 प्रतिशत जनसंख्या अभी भी निरक्षर है जिसके कारण भारत विश्व में सर्वाधिक निरक्षर लोगों वाला देश है। हमारे विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता अधिकत्तर मामलों में वैश्विक मानदंडों से कम है।

यू.एन.डी.पी. के 2011 के मानव विकास प्रतिवेदन में कुल 187 देशों में से भारत 134वें स्थान पर है। इससे मिश्रित सूचकांक, जिसके अन्तर्गत आयु संभाविता, शैक्षिक उपलब्धि और आय शामिल है, के संबंध में कमी परिलक्षित होती है। यह विगत कुछ दशकों में सकल घरेलू उत्पाद में विकास दर में हुई वृद्धि के बावजूद है।

इससे भी अधिक, राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक-आर्थिक मानदंडों के सकल आंकड़ों के अलावा, लिंग,जाति, धर्म, राज्य और यहां तक कि ग्रामीण-शहरी अंतर संबंधी क्षैतिज और लम्बवत असमानता से स्थिति की गंभीरता और भी बढ़ जाती है।

इसी प्रकार, यदि और अधिक निवेश तथा गुणवत्ता नियंत्रण के जरिए सामान्य और तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता और संख्या नहीं बढ़ाई जाती है तो कुशल जनशक्ति की कमी विकास संबंधी हमारी उच्च आकांक्षाओं में बाधा बनी रहेगी।

इन सबके लिए एक पूर्वापेक्षा शासन तथा उपलब्धता तंत्र का सुधार है। इस प्रयोजन से, महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों यथा न्यायपालिका, पुलिस, निर्वाचन प्रणाली, भ्रष्टाचार निवारण कानून, पर्यावरण कानून तथा शिक्षा प्रणाली इत्यादि में सुधार अनिवार्य हैं।

यह बात स्पष्ट है कि भारत को एक मजबूत, आधुनिक तथा समृद्ध राष्ट्र बनाने के लिहाज से 1947 में हमने जिस कार्य को पूरा करने का बीड़ा उठाया था वह कार्य अभी भी चल रहा है और अभी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है।

इनमें सबसे पहला कार्य भ्रष्टाचार का निवारण करना, राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त करना तथा निर्वाचन प्रणाली में सुधार के जरिए अपने लोकतंत्र के कार्यकरण में सुधार करना होगा। इसके अलावा, 'हमारे सामाजिक तथा आर्थिक जीवन में एक व्यक्ति एक मत एक मूल्य' के सिद्धांत को, जिसकी संकल्पना डॉ. अम्बेडकर ने की थी, साकार करने के लिए, हमें निर्धनता, बेरोजगारी, निरक्षरता, भूख तथा जन्म, कुल, धर्म, भाषा अथवा क्षेत्र पर आधारित भेदभाव जैसी सामाजिक तथा आर्थिक बुराइयों का मुकाबला कर उनका उन्मूलन करना होगा।

यद्यपि हम तीव्र तथा समावेशी आर्थिक वृद्धि और विकास के अपने मुख्य लक्ष्य पर चल रहे हैं, तथापि हमें विकास प्रक्रिया के स्थायित्व को, विशेष रूप से अपनी भावी पीढ़ियों के वास्ते अपने राष्ट्रीय पर्यावरण तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को समान महत्त्व भी देना होगा।

हमारी आबादी के आकार तथा समस्याओं की जटिलता को देखते हुए यह कार्य बहुत बड़ा है। इस कार्य को सिर्फ सरकार पर ही नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए एक ऐसा निरन्तर राष्ट्रीय प्रयास अपेक्षित होता है जिसमें सभी पक्ष - सरकार, सभ्य समाज, गैर-सरकारी संगठन, निगमित क्षेत्र तथा सबसे बढ़कर, प्रत्येक नागरिक - सम्मिलित होते हैं ।

वक्कोम मौलवी, श्री राजगोपाल तथा वक्कोम मौलवी फाउंडेशन ट्रस्ट द्वारा स्थापित उदाहरण हमारा मार्गदर्शन करते हैं। इस आदर्श का अनुकरण किया जा सकता है।

हम सभी के लिए संदेश यह है कि निराशा कोई विकल्प नहीं है, ना ही समर्पण कोई समाधान है। नागरिकता अधिकार प्रदान करती है और कर्तव्य अधिरोपित करती है। हमें गांधीजी की इस सलाह को नागरिक कर्म हेतु मंत्र के तौर पर मानना होगा, "जो परिवर्तन आप विश्व में देखना चाहते हैं उसके अनुसार ढल जाईये"।

एक बार एक परोपकारी व्यक्ति ने यह कहा कि "प्रत्येक अधिकार का तात्पर्य उत्तरदायित्व से; प्रत्येक अवसर का तात्पर्य दायित्व से; प्रत्येक आधिपत्य का तात्पर्य कर्तव्य से है "।

यदि हम अपने दैनिक जीवन में इसका अनुसरण करते हैं, तो हम अपने संविधान की उद्देशिका के प्रारंभिक शब्दों में व्यक्त संकल्प को पूरी तरह साकार करने में सफल होंगे जिसमें 'हम, भारत के लोगों' ने अपने महान देश में सभी के लिए न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता को सुस्थापित करने के लिए स्वयं को प्रतिबद्ध किया है।

मैं श्री राजगोपाल को पुरस्कार प्राप्त करने पर बधाई देता हूं और वक्कोम मौलवी ट्रस्ट के प्रति उसके भावी प्रयासों में पूर्ण सफलता की कामना करता हूं।

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