17 जून, 2017 को नई दिल्ली में क्वीन ऑफ ट्रावनकोर के रॉयल एडिक्ट की द्विशताब्दी के अवसर पर समावेशी गुणवत्तायुक्त शिक्षा संबंधी सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री मो. हामिद अंसारी का अभिभाषण

नई दिल्ली | जून 17, 2017

अब यह निर्विवाद है कि शिक्षा किसी देश के आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरण संबंधी क्षेत्रों में सतत विकास की नींव है। यह एक मर्यादित जीवन के अधिकार और गरीबी तथा असमानताओं को कम करने के लिए व्यक्ति के विकास का प्रमुख तत्व है।

समान शिक्षा स्वास्थ्य, पोषण और पर्यावरण के क्षेत्रों में विकास के लक्ष्यों तक पंहुचने का साधन है। यह लोगों को व्यावसायिक एकीकरण के लिए आवश्यक ज्ञान और कौशल प्रदान करती है और उत्पादकता, नवोन्मेषण और उद्यमिता को बढ़ावा देती है।

शिक्षा आजीविका के लिए कौशल के विकास करने से अधिक है। यह सोच-विचार करने की क्षमता का सृजन करती है और राजनैतिक विकास, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की अनिवार्य शर्त है। इस कारण से और इतिहास के विभिन्न चरणों में, शिक्षा तक पंहुच सामाजिक और इसलिए शासकों और तानाशाहों के हाथों में राजनैतिक नियंत्रण का एक शक्तिशाली साधन भी था।

II

हमारे अपने देश के इतिहास में, केरल एक मिसाल रहा है। शिक्षा ने, केरल के एक जातिवाद से ग्रस्त समाज से हमारे एक अधिक समतावादी राज्यों में परिवर्तित होने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। यह पहल दो सदी पूर्व की गई थी और वह इस सम्मेलन की पृष्ठभूमि भी है। इसके परिणामस्वरूप और इस समय के दौरान इस राज्य में साक्षरता की दर 19वीं सदी की शुरूआत से ऐतिहासिक रूप से अधिक रही है। इससे शिक्षा के लिए सर्वसाधारण के एकजुट होने का मार्ग प्रशस्त हुआ और एक सक्रिय नागरिक वर्ग का सृजन हुआ जो आधुनिक केरल का निर्धारक पहलू है। प्रो. अमर्त्य सेन ने इसे "इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की रचनात्मक और संघर्षशील बुनियाद" कहा है।

ये जड़ें केरल का अपना स्वदेशी बौद्धिक इतिहास है और उसके वैश्विक संपर्क का प्रभाव हैं। इसके वैश्विक सम्पर्क के कारण राज्य में सहिष्णु बहुलतावाद का जन्म हुआ जो अन्य लोगों और संस्कृतियों के लिए अपने द्वार खोलने से हुआ क्योंकि मेजबान समाज अन्य परंपराओं और जीने की अन्य पद्धतियों से सीखने के लिए जागरूक रहता है। केरल का बौद्धिक इतिहास इसके शिक्षा-अनुकूल दृष्टिकोण का परिणाम है।

दो सौ साल पहले, त्रावणकोर की रानी गौरी पार्वती बाई ने एक शाही उद्घोषणा जारी की जिसमें कहा गया:

“राज्य को अपने लोगों की शिक्षा की संपूर्ण लागत का वहन करना चाहिए क्योंकि लोगों के बीच ज्ञानोदय के विस्तार में कोई पिछड़ापन न हो....।”

तत्कालीन शासक वर्ग के लिए सर्व शिक्षा शुरू करने के पीछे चाहे जो भी प्रेरणा रही हो, जो इसके परिणाम असाधारण रहे थे। त्रावणकोर के एक अन्य शासक ने अपनी शिक्षा नीतियों को स्पष्ट करते हुए कहा था,

“कोई ऐसी सरकार जिसे शिक्षित लोगों के साथ कार्य करना होता है, वह उस सरकार से काफी अधिक मजबूत होती है जिसे अशिक्षित और अव्यवस्थित जनता को नियंत्रित करना होता है। इसलिए, शिक्षा दो प्रकार से लाभकारी है - यह शिक्षा देने वाले और शिक्षा प्राप्त करने वाले दोनों को लाभान्वित करती है।”

यद्यपि कुलीन वर्ग यह मान सकता है कि शिक्षा के प्रसार के द्वारा, उनके पास एक अधिक लोचशील जनसंख्या हो सकती है परंतु जैसा राबर्ट मेर्टन ने इसे बताया, "उद्देश्यपूर्ण सामाजिक कार्रवाई के अप्रत्याशित परिणाम" शायद इच्छा के पूर्णतया विपरीत थे। विडम्बना यह थी कि इन्हीं शिक्षा सुधारों जिन्हें जनसंख्या पर शासन को सरल बनाने के लिए किया गया था, ने उन सामाजिक आन्दोलनों को प्रेरित किया जो बाद के वर्षों में पूरे केरल में फैल गये।

शिक्षा को अधिक सुगम बनाने में राज्य का हस्तक्षेप केरल में पिछड़ेपन, अंधविश्वास, रूढ़िवाद और जातिवाद के विरूद्ध प्रगतिशील शक्तियों को उन्मुक्त करने में अग्रदूत बना। श्री नारायण गुरु, द नायर सर्विस सोसाइटी, द मुस्लिम एजूकेशनल सोसाइटी (एमईएस) और ईसाई मिशनरियों जैसे सुधारकों के प्रयासों के कारण शिक्षा ने एक सामाजिक आंदोलन का रूप लिया।

सिविल सोसाइटी की सक्रियता ने इसमें योगदान दिया। जातीय असमानताओं के विरोध ने जन शिक्षा अनुकूल रूप ले लिया। जिस प्रकार शिक्षा के प्रसार से जाति, वर्ग और लिंग की पारंपरिक असमानताओं से निपटने में मदद मिली, उसी प्रकार इन असमानताओं के हटने से शिक्षा के प्रसार में सहयोग मिला।

केरल की राजनीति, विशेष रूप से वर्ष 1950 के बाद से, जन सक्रियता और शिक्षा के प्रसार के माध्यम से सामाजिक असमानताओं के विरोध की उसी लय में जारी रही। निर्वाचित सरकारों ने भी लोगों की इच्छा के अनुरूप ऐसी नीतियों का अनुसरण किया जो शिक्षा तक पंहुच को बढ़ाने के लिए लक्षित थीं। 1958 का केरल शिक्षा अधिनियम एक युगांतकारी विधान था और इससे केरल राज्य में शिक्षा संस्थानों के बेहतर संगठन और विकास का अवसर प्राप्त हुआ। इस अधिनियम में एक महत्वपूर्ण उपबंध नि:शुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा था जिससे राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा के अधिकार की शुरूआत हुई जिसे 2010 में पूरे भारत में स्वीकार किया गया।

इन्हीं नीतिगत कदमों ने केरल को 1991 में पूर्ण साक्षरता प्राप्त करने वाले प्रथम भारतीय राज्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

III

केरल में शिक्षा के प्रसार से भारत के कई दूसरे राज्यों की तुलना में बेहतर स्वास्थ्य परिचर्या के अधिकारों का समर्थन करने की लोगों की क्षमता, और अधिक सार्वजनिक सेवाओं और उनकी वितरण व्यवस्था की निगरानी की मांगे, लैंगिक समानता के लिए बेहतर माहौल और इन सबसे अधिक गरीबों की आय में तेजी से वृद्धि हुई।

केरल के सामाजिक और आर्थिक सूचकांक विकासशील देशों की तुलना में विकसित देशों के ज्यादा करीब हैं। ये सामान्य जन की शिक्षा की परिवर्तनकारी प्रकृति के साक्ष्य हैं।

भारत सरकार के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि केरल 4.9 प्रतिशत की दर से आबादी की दशकीय वृद्धि और 1084 के लिंगानुपात के साथ सर्वाधिक कार्यक्षम राज्य है अर्थात भारतीय राज्यों में इसका प्रदर्शन सर्वश्रेष्ठ है। भारत की 40 की औसत शिशु मृत्यु दर की तुलना में केरल में शिशु मृत्यु दर सबसे कम 12 है। भारत की औसत जन्म-दर 21.4 की तुलना में केरल में यह जन्म दर 14.7 है। इन आंकड़ों का मूल कारण उच्च साक्षरता स्तर है।

उच्च साक्षरता से अन्य, अपेक्षाकृत नए सामाजिक-आर्थिक मानदण्ड भी प्रभावित हुए हैं। उदाहरण के लिए केरल में बैंकिंग सुविधाओं का लाभ उठाने वाले परिवारों का प्रतिशत 58.7 प्रतिशत के राष्ट्रीय आंकड़े की तुलना में 74.2 प्रतिशत था। इसी प्रकार, केरल में शौचालय युक्त घरों, जिसे केन्द्र सरकार स्वच्छ भारत अभियान के तहत पुरजोर ढंग से बढ़ावा देने का प्रयास करती रही है, का प्रतिशत समस्त भारत के 46.8 प्रतिशत के कुल औसत की तुलना में 95.2 प्रतिशत था।

शिक्षा में किए गए निवेश के परिणाम इक्कीसवी सदी के आरंभिक वर्षों से दृष्टिगोचर होने लगे थे जब केरल की उच्च कौशल प्राप्त एवं शिक्षित जनता तथा तेजी से वैश्वीकृत होते विश्व के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था को खोले जाने के परिणामस्वरूप राज्य में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई। वर्ष 2010 के अंत तक, जहां समग्र भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी से विस्तार हुआ वहीं केरल की प्रति व्यक्ति आय भारतीय औसत से 34 प्रतिशत अधिक थी।

जैसा कि उच्च शिक्षा स्तर वाले समाजों में अपेक्षित होता है, केरल के सकल घरेलू उत्पाद का एक बड़ा हिस्सा सेवा क्षेत्र और विप्रेषणों से आता है। वैश्विक मंदी और हमारे पड़ोसी राष्ट्रों में अस्थिर राजनैतिक स्थितियों के लौट आने पर कुछ लोगों ने चिंता जताई है। रोजगार के सृजक क्षेत्र के रूप में विनिर्माण क्षेत्र के विस्तार की मांग की गई है। तथापि, विनिर्माण पद्धतियों में परिवर्तनों तथा विनिर्माण प्रक्रिया में स्वचालन और रोबोटिक्स की भूमिका को देखते हुए, इस क्षेत्र को हर समस्या का हल समझना घातक हो सकता है।

सिंगापुर जैसी अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं को भी कुछ वर्षों पूर्व इसी प्रकार की स्थिति - जहां शिक्षित जनसंख्या के कारण अर्थव्यवस्थाएं सेवा आधारित होतीं हैं- का सामना करना पड़ा था। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप उन्होंने उद्योगों और सेवाओं के अधिक उन्न्त, मूल्य वर्धित स्तरों की ओर रुख करते हुए आर्थिक संरचना को सोच समझ कर उन्नत बनाया था।

प्रतिस्पर्धी बने रहने और अपने प्रतिभासंपन्न, शिक्षित युवाओं को नियोजित करने के लिए केरल को भी अपने ऐसे आर्थिक कार्यकलापों पर ध्यान केंद्रित करना होगा जिनमें उसकी विशिष्ट क्षमताओं-एक शिक्षित कार्यबल, लोकतांत्रिक संस्थाओं और अनुकूल प्राकृतिक परिवेश को उपयोग में लाया जाता हो। केरल की सामाजिक प्रगति ने उसकी आर्थिक प्रगति, जो सामाजिक और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ है, के लिए मंच तैयार कर दिया है।

राज्य द्वारा ज्ञान-आधारित और कौशल-गहन आर्थिक कार्यकलापों की पहचान किए जाने की आवश्यकता है। केरल के ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में पहले से ही एक सुविकसित संचार अवसंरचना मौजूद है। इससे विकास की एक अधिक व्यापक पद्धति लागू की जा सकेगी। अनुसंधान और विकास जैसे ज्ञान आधारित कार्यकलापों के लिए शीघ्र एक अनुकूल परिवेश तैयार करने हेतु आधार प्रदान करने के लिए मौजूदा और नए शैक्षणिक संस्थानों के साथ मिलकर नेटवर्क तैयार किया जा सकता है और अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण किया जा सकता है।

अत: एक वास्तविक ज्ञान आधारित समाज के रूप में परिवर्तित होने के लिए यह आवश्यक है कि केरल को 'इक्कीसवीं सदी के लिए आवश्यक कौशलों' जैसे कि समीक्षात्मक विचारधारा, समस्याओं के समाधान की क्षमता, सृजनात्मकता और डिजिटल साक्षरता आदि के संबंध में शिक्षा प्रदान की जाए। हर आयु के शिक्षार्थियों के लिए नवीन प्रौद्योगिकियों की जानकारी होना और तेजी से बदलते कार्यस्थल परिवेश से तालमेल बैठाने की क्षमता होना आवश्यक है। सुदृढ़, समावेशी और उच्च गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रणालियां - जो योग्यताप्राप्त, व्यावसायिक रूप से शिक्षित, उत्प्रेरित और सु-समर्थित शिक्षकों द्वारा समर्थित हों-इस प्रयास की आधारशिला होंगी।

IV

केरल का यह अनुभव इस पूर्वधारणा के लिए एक चुनौती है कि गरीबी से निकलने के लिए देश में राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक विकास का होना आवश्यक है। इससे यह प्रदर्शित होता है कि सार्थक शैक्षिक सुधार करने और क्रियाशील नागरिक समाज को पोषित करने से पारंपरिक आर्थिक वृद्धि मापदण्डों की सहायता के बिना भी एक बेहतर जीवन स्तर का निर्माण किया जा सकता है। यह शिक्षा के महत्व का बोध होने और उसको साकार करने के लिए समर्पित प्रयासों का परिणाम है।

मैं इस सम्मेलन के सफल होने की कामना करता हूं।
जय हिन्द।