18 जुलाई, 2017 को ताज पैलेस होटेल, नई दिल्ली में आयोजित ऑल इंडिया मैनेजमेंट असोसिएशन जेआरडी टाटा कॉरपोरेट लीडरशिप अवार्ड्स समारोह के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री मो. हामिद अंसारी का अभिभाषण

नई दिल्ली | जुलाई 18, 2017

कुछ वर्ष पूर्व, दो प्रबंधन गुरूओं ने यह कहा था कि अनुकूलन क्षमता जटिल और सक्रिय वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक माहौल में बने रहने और वृद्धि करने की कुंजी है और जब भारतीय व्यवसाय अनुकूल रूप से सोचना और कार्य करना सीख लेंगे तो वे त्वरित वृद्धि के पथ पर अग्रसर होंगे।1.

वैश्विक वृद्धि के निरंतर धीमे स्तर और उत्पादन की प्रौद्योगिकी में त्वरित परिवर्तनों तथा वास्तविक उपभोक्ताओं को दी जा रही प्राथमिकता को देखते हुए आज भारतीय कॉरपोरेट जगत के समक्ष तेजी से विकसित होते प्रौद्योगिकीय परिदृश्य में प्रतिस्पर्धा करते हुए संरक्षणवादी सत्ताओं को जन्म देने वाली मंदी के दौर में अपनी वृद्धि को बनाए रखने की चुनौती है। यह चिंता का विषय है कि अनेक भारतीय कंपनियां स्वयं को इस प्रतिस्पर्धात्मक और प्रतिबंधात्मक परिदृश्य के अनुकूल ढालने में निरंतर कठिनाई का अनुभव कर रही हैं।

यहां मैं कुछ कटु सत्यों का वर्णन करना चाहता हूँ। अनेक भारतीय कंपनियों के लिए, प्रतिस्पर्धा अपने आप में एक नई अवधारणा है। भारतीय व्यवसाय परंपरागत रूप से जोखिम के विरूद्ध रहे हैं। घरेलू व्यवसाय माहौल में कंपनियों के बीच गहन प्रतिस्पर्धा के अभाव में, कुछ उल्लेखनीय उदाहरणों को छोड़ कर, अधिकांश भारतीय कंपनियों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा का प्रारंभिक ज्ञान और अनुभव नहीं है। इसके अतिरिक्त, सरकार का निरंतर संरक्षण प्राप्त होने के कारण वह आत्मसंतुष्ट हैं और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मक चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं।

भारतीय कंपनियों के आंतरिक माहौल में ऐसे परिवर्तन की वास्तविक आवश्यकता है जो प्रतिस्पर्धात्मक सोच और व्यवहार को प्रोत्साहन दे सके।

हमारे कॉरपोरेट जगत की ये आंतरिक दुर्बलताएं पिछले कुछ वर्षों की धीमी अंतर्राष्ट्रीय वृद्धि तथा भारतीय कंपनियों की तथाकथित 'ऋण-आसक्ति' के साथ संयोजित हो गई हैं। आर्थिक मंदी के संकेत स्पष्ट दिखाई देने के बाद शेयर बाजार में निवेश रूक गया, लेकिन कॉरपोरेट भारत ऋण सृजित करता रहा।

2009 और 2014 के बीच, भारतीय कॉरपोरेट जगत ने अपने कुल ऋण को दोगुने से अधिक कर लिया और यह 20 लाख करोड़ रूपये से बढ़कर 41 लाख करोड़ रूपये से अधिक या लगभग 690‍ बिलियन डॉलर हो गया। सीएमआईई प्रोवेस डेटाबेस में 18000 से अधिक कंपनियों के सर्वेक्षण से पता चलता है कि पिछले चार वर्षों में जहां समग्र राजस्व में 77 प्रतिशत की वृद्धि हुई, वहीं उनका ऋण दोगुना हो गया और ब्याज भुगतान में 146 प्रतिशत की वृद्धि हुई। लेकिन साथ ही, कुल लाभ में 32 प्रतिशत की गिरावट आई।

II

हमें दुनियाभर में हमारे सेवा क्षेत्र के लिए जाना जाता है जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद मंज 60 प्रतिशत से अधिक का योगदान देता है। तथापि, यह उतनी मात्रा में रोजगार नहीं देता है - रोजगार में इसका योगदान केवल 15 प्रतिशत है। भारत जैसे विशाल और अधिक जनसंख्या वाले देश के लिए यह आवश्यक है कि विनिर्माण क्षेत्र का उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में बड़ा हिस्सा हो ताकि अधिकाधिक रोजगार और समृद्धि सुनिश्चित हो। यद्यपि हमारे देश में घरेलू खपत बढ़ रही है, तथापि विदेशी बाजारों में तेजी से और गहरी पैठ बनाने से हमें विकास को गति देने में मदद मिलेगी। इसके अलावा, लाभप्रद विकास के लिए, हमें एक प्रीमियम के लिए प्रयास करना होगा जो केवल तभी प्राप्त होगा जब हम उन उत्पादों को लक्ष्य बनाएं जिनमें उच्च गुणवत्ता वाले डिजाइन, इंजीनियरी और विनिर्माण की आवश्यकता हो।

तथापि, वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने के लिए भारतीय विनिर्माण की उत्पादकता और कार्यकुशलता में प्रभावशाली तरीके से सुधार करने की आवश्यकता है। एशियन प्रॉडक्टिविटी आर्गेनाइजेशन (एपीओ) के उत्पादकता डाटाबेस 2014 के अनुसार भारत में औसत कुल साधन उत्पादकता (टीएफपी) वर्ष 2000-05 में 2 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2005-10 में 4.7 प्रतिशत हो गई परंतु अगले दो वर्षों में इसमें 0.9 प्रतिशत की गिरावट आई। वर्ष 2010-12 में, भारत में टीएफपी ने जीडीपी की वृद्धि में 11 प्रतिशत का अंशदान दिया है। तुलनात्मक दृष्टि से चीन की जीडीपी वृद्धि में इसका हिस्सा 26 प्रतिशत था।

इस समय, अधिकांश भारतीय कंपनियां घटक या ब्रांड रहित उत्पादों की बिक्री करके वैश्विक मूल्य शृंखला में निम्नतम स्तर पर प्रचालन करती हैं। यह बात सेवा क्षेत्र में कार्यरत हमारी फर्मों के लिए भी सत्य है। हमारी कंपनियों के समक्ष चुनौती ऐसी व्यापारिक क्षमताओं का विकास करना है जो उन्हें मूल्य शृंखला में शीर्ष स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाए।

"मेक इन इंडिया" के विज़न का उद्देश्य इसमें सुधार करना है। तथापि, हमारे अतिरंजित लागत लाभ भी संभवत: वैश्विक मंच पर अन्य बड़े उत्पादकों से प्रतिस्पर्धा करने के लिए पर्याप्त न हों । घरेलू बाजारों के सापेक्षिक आकार को देखते हुए, निकट भविष्य में इसकी संभावना नहीं है कि हमारी फर्में उन मापदंडों को प्राप्त करने में सक्षम हो पाएंगी जो पूर्वी एशिया में उनके प्रतिस्पर्धियों ने अनेक उत्पादों के लिए स्थापित कर ली हैं। पैमाने के लाभ के साथ -साथ लागत लाभ और सरकार का सशक्त समर्थन, वहां श्रम की बढ़ती हुई लागतों के बावजूद अधिकांश उत्पादों के लिए लागत के संबंध में हमारे लिए प्रतिस्पर्धा को अब भी चुनौतीपूर्ण बना देते हैं । इसके अलावा, 3-डी प्रिंटिंग, रोबोटिक्स और आटोमेशन जैसी नई विनिर्माण तकनीकों के आगमन के साथ - विनिर्माण की बदलती हुई प्रकृति से भारतीय फर्मों के समक्ष नई-नई चुनौतियां उत्पन्न हो रही हैं।

मिंट समाचार-पत्र में हाल के एक महत्वपूर्ण लेख में, भारत की सफलता की दो प्रमुख कहानियों - सूचना प्रौद्योगिकी और भेषज क्षेत्रों, जिनमें कुछ भारतीय कंपनियां वैश्विक रूप से अग्रणी बन गईं हैं - के समक्ष बढ़ती हुई मुश्किलों का मुद्दा उठाया गया। सूचना प्रौद्योगिकी और भेषज क्षेत्र के समक्ष मौजूद चुनौतियां अन्य भारतीय विनिर्माताओं के समक्ष चुनौतियों से अलग नहीं हैं।

इन चुनौतियों पर काबू पाना और हमारी कंपनियों का भावी विकास अत्याधुनिक व्यावसायिक परिदृश्य और अभियांत्रिक हस्तक्षेप निर्मित करने में सक्षम होने में है न कि इनके परिणामों का सामना करने में है। संक्षेप में कहा जाए, तो हमारी कंपनियों को अपेक्षाकृत और अधिक नवोन्मेषी होना होगा।

2015 में 'डिजिटल डायलॉग' में भाग लेते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने उद्यमिता और नव-परिवर्तन को सुगम बनाने के लिए 'पूर्ण सहायता' देने का वायदा किया था ताकि भारत नवप्रवर्तनशीलता का केन्द्र बनकर उभर सके और तेजी से बदलते हुए विश्व के साथ कदम से कदम मिलाकर चल सके। उन्होंने कहा था, "विश्व जितनी तेजी से आज बदल रहा है उतनी तेजी से कभी नहीं बदला है और हम उसके प्रति बेखबर नहीं रह सकते हैं। यदि हम नवोन्मेष नहीं कर पाएंगे, यदि हम अग्रणी उत्पादों की बराबरी नहीं कर पाएंगे तो सब कुछ ठहर जाएगा।”

अटल नवोन्मेष मिशन (ए.आई.एम.) की रूपरेखा निर्धारित करने के लिए डा. तरुण खन्ना की अध्यक्षता में गठित नीति आयोग की एक विशेषज्ञ समिति के प्रतिवेदन में यह टिप्पणी की गई है कि नवोन्मेष करना आज जितना महत्वपूर्ण है उतना कभी भी रहीं रहा क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था औद्योगिक अर्थव्यवस्था से नवोन्मेषी अर्थव्यवस्था की ओर परिवर्तित हो रही है।" यह अधिकारिक सोच को पर्याप्त रूप से दर्शाता है।

इसके बावजूद, नवोन्मेष किसी निर्वात में नहीं होते हैं या सिर्फ इसलिए नहीं होता क्योंकि यह अपेक्षित है। इस संबंध में कुछ महीने पहले श्री एन. आर. नारायणमूर्ति ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न किया था "भारत में पिछले 60 वर्षों के दौरान कोई भी धरती को हिलाकर रख देने वाला कोई आविष्कार या प्रौद्योगकीय परिवर्तन क्यों नहीं हो सका?"

III

सत्य यह है कि हम अपने साथियों सहित अनेक देशों से पिछड़ गए हैं। ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स 2016 में हमारे देश को 128 देशों में 66वां दर्जा दिया गया है। यद्यपि इस दर्जें में पिछले वर्ष की तुलना में 15 स्थानों का सुधार हुआ है, मगर भारत फिर भी चीन के 25वें, रूस के 43वें और दक्षिण अफ्रीका के 54वें स्थान से काफी पीछे है।

अनुसंधान और विकास (आर एण्ड डी) के क्षेत्र में हमारे निम्न स्तरीय निवेश को देखते हुए यह निराशाजनक प्रदर्शन आश्चर्यजनक नहीं है। विश्व बैंक के अनुसार, वर्ष 2014 में भारत का आर एण्ड डी में सकल व्यय इसके सकल घरेलू उत्पाद का 0.63 % था, जबकि इस ओर चीन द्वारा 1.5% और ब्राजील द्वारा 1.1% व्यय किया गया। वहीं दूसरी ओर कई विकसित देश अपने आर एण्ड डी में 4% से अधिक व्यय करते हैं।

भारत को आर एण्ड डी के क्षेत्र में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफ डी आई) के मामले में शीर्षस्थ गंतव्य देश माना गया है। जहां वर्ष 2016 में आर एण्ड डी में निवेश का बाजार मूल्य 22.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर था। इसके विपरित भारत के निजी क्षेत्र द्वारा आर एण्ड डी में घरेलू निवेश बहुत मामूली रहा क्योंकि देश में अभी भी अनुसंधान पर सरकार द्वारा कुल निवेश का 77 प्रतिशत व्यय किया जाता है।

बाजार मूल्यों की दृष्टि से भारत की सबसे बड़ी निजी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने 2015 में आर एण्ड डी में अपने राजस्व की 0.32% राशि व्यय की, जो नगण्य व्यय है। जब कि एल एण्ड टी, जो कि अनिवार्य रूप से इंजीनियरिंग कंपनी है, ने 0.36% राशि निवेश की थी। यदि तुलना की जाए तो उभरते बाजारों की दो प्रमुख कंपनियों, पैट्रोब्रास और पैट्रोचाइना ने क्रमश: 1.3% और 1% राशि व्यय की। जर्मनी की बड़ी इंजीनियरिंग कंपनी सिमेन्स ने अपने राजस्व का 5% अनुसंधान और विकास कार्यों पर खर्च किया।

सरकार, अनुसंधान अैर विकास कार्यों में निवेश की इच्छुक भारतीय कंपनियों को कर में छूट सहित कई प्रकार के प्रोत्साहन प्रदान करती है, लेकिन फिर भी 2016 में, केवल 1800 भारतीय कंपनियों ने ही इन प्रसुविधाओं के लिए आवेदन किया था।

इस प्रकार, उद्योगों को महज प्रोत्साहन देना नवोन्मेषी विकास को प्रोत्साहन देने के लिए पर्याप्त नहीं है, हमारे कॉरपोरेट क्षेत्र को निवेश करना होगा और अनुसंधान और विकास कार्यों और नवोन्मेष के क्षेत्र में अच्छा-खासा निवेश करना होगा। हमें शिक्षा के क्षेत्र में मौजूद असंतुलन को दूर करने, देश की जनता को न केवल आज उपलब्ध नौकरियों, वरन भावी संभावित रोजगार के लिए उपयुक्त कौशल प्रदान करने के लिए उसी तरह व्यापक तौर पर प्रयास करने की आवश्यकता है जैसे कि हम अवसंरचना सृजित करने और व्यापार परिवेश के लिए अनुकुल माहौल तैयार करने में निवेश करते हैं। हमें अंततोगत्वा तीव्र गति से नवोन्मेष और उद्यमिता के लिए आवश्यक 'संस्कृति और नजरिया' तैयार करने की दिशा में कार्य करने की आश्यकता है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली में एक वार्ता के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर ने "विचारों का कारखाना चालू रखने के लिए' राष्ट्र को कुछ उपाय सुझाए थे। उनके विचार से "यह मानते हुए भी कि किसी भी विचार को अस्वीकार करने के लिए प्रायोगिक परीक्षण जरूरी है, सभी प्रकार की सत्ता और परंपरा को चुनौती देने को प्रोत्साहित करके 'बाजार में विचारों के लिए प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना', पहली आवश्यकता है। दूसरी आवश्यकता, "किन्हीं विशिष्ट विचारों और परंपराओं के बजाय सवाल पूछने और चुनौती देने के अधिकार, लीक से हटकर व्यवहार करने के अधिकार का तब तक संरक्षण करना जब तक कि उससे औरों को गंभीर आघात न पहुंचे, इस संरक्षण में समाज का अपना हित निहित है, क्योंकि प्रगतिशील विद्रोहियों की चुनौतियों को प्रोत्साहन देने से ही समाज का विकास होता है," की है।”

उपर्युक्त प्रत्येक आवश्यकता के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अनुकूल सामाजिक वातावरण जरूरी है।

हमने भारतीय व्यवसाय के क्षेत्र में ऐसे उदाहरण देखे हैं जहां किसी प्रेरणापरक नेतृत्व की शैली से कंपनी में गतिशीलता आई। ये पुरस्कार जिस व्यवसायी की स्मृति में दिए जाते हैं, वह भी ऐसे ही दृष्टा थे। श्री एन. चंद्रशेखर इस पुरस्कार के लिए सर्वथा योग्य हैं, वह कारपोरेट नेतृत्व की महान विरासत के योग्य उत्तराधिकारी हैं और उन्होंने टाटा कंपनियों को महान ऊंचाइयों तक पहुँचाया है। मैं उन्हें उनकी इन उपलब्धियों के लिए बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि उनके द्वारा प्रस्तुत उदाहरण से भारतीय व्यावसायिक नेतृत्व को उत्कृष्टता की प्रेरणा मिलेगी।
जय हिंद।


1Raghavan Parthasarthy and N. S. Chandrasekaran, Global competition: strategies for Indian businesses, The Hindu, April 05, 2001
2http://www.business-standard.com/article/companies/lupin-tata-motors-lead-in-r-d-spending-116050600031_1.html
3Recognized under scheme offered by Department of Scientific & Industrial Research (DSIR) under Ministry of Science & Technology