20 जुलाई, 2017 को शहीद नानक सिंह मेमोरियल लेक्चर के अवसर पर भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री मो. हामिद अंसारी का अभिभाषण

Error message
  • Unable to create CTools CSS cache directory. Check the permissions on your files directory.
  • Unable to create CTools CSS cache directory. Check the permissions on your files directory.
नई दिल्ली | जुलाई 20, 2017

स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत

शहीद नानक सिंह मेमोरियल लेक्चर में अपने विचार व्यक्त करने के लिए मुझे आमंत्रित किया जाना मेरे लिए सम्मान की बात है।

शहीद नानक सिंह फाउंडेशन ने एक दिलेर स्वतंत्रता सेनानी और विशिष्ट मानव की स्मृति को सुरक्षित रखने और उस स्मृति को संजोए रखने में अपनी संरक्षणकारी सेवाएं दीं हैं। शहीद नानक सिंह स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक विख्यात नेता थे। उन्होंने न केवल स्वतंत्रता के लिए आंदोलन किया बल्कि अंग्रेजों की 'फूट डालो और शासन करो' की नीति के चलते सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए भी कार्य किया। उन्होंने भारत के बंटवारे का पुरजोर विरोध किया। उनका जीवन आदर्श समसामायिक भारत के लिए मूल्यवान सबक है। शहीद नानक सिंह की विरासत उन बहादुर और प्रेरणादायक पुरुषों और महिलाओं की विरासत का हिस्सा है जिन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने के लिए संघर्ष किया।

II

आधुनिक भारतीय राष्ट्र की छवि और मूल्य जो आज भी हमारे राष्ट्र को आकार देते हैं और उसे लगातार समृद्ध बनाते हैं, औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए हमारे संघर्ष के दौरान विकसित हुए थे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हमें जो अनुभव प्राप्त हुए उन्हें हमने अधिकांशत: अपने संविधान में सहेजकर रखा है जो आज भी भारत में हमारे राजनीतिक और न्यायिक संवाद को उजागर करते हैं।

स्वतंत्रता संग्राम केवल स्वाधीनता के लिए संघर्ष नहीं था। यह एक राष्ट्र के निर्माण के लिए कवायद थी। यह मात्र औपनिवेशिक शासन को समाप्त करने और भारतीयों को राजनीतिक शक्ति प्रदान करने के लिए आंदोलन नहीं था परंतु उसका उद्देश्य उस शक्ति को प्रत्येक भारतीय के लिए सामाजिक और आर्थिक न्याय और गरिमा सुनिश्चित करने हेतु उपयोग करना था। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए जो संघर्ष किया था वह न केवल विदेशी शासन की बेड़ियों को तोड़ने के लिए था, अपितु उस समय हमारे समाज में प्रचलित सामाजिक बुराइयों और प्रगति-रोधी परिपाटियों को समाप्त करने के लिए भी था। भारत भाग्यशाली रहा कि असाधारण प्रतिभावान और बुद्धिमान व्यक्ति संघर्ष की अवधि के दौरान मौजूद थे। उनकी नैतिक सत्यनिष्ठा उच्च कोटि की थी, इनमें से सबसे अग्रणी महात्मा गांधी थे, जिनके एकल प्रयासों ने इस संघर्ष को किसी विशिष्ट वर्ग के अभियान से सही मायनों में एक जन अभियान के रूप में परिवर्तित कर दिया।

महात्मा गांधी ने सत्य और न्याय के लिए अहिंसक आग्रह - सत्याग्रह, का प्रयोग करते हुए अत्याचारी शासन का विरोध करने की इच्छुक जनता को एक राजनीतिक साधन दिया। संघर्ष के एक साधन के रूप में सत्याग्रह, लोगों की सक्रिय भागीदारी और भागीदारी न करने वाले लाखों व्यक्तियों की सहानुभूति और सहयोग पर आधारित था। हिंसक क्रांति, जो अल्प संख्या में प्रतिबद्ध काडर और योद्धाओं द्वारा की जा सकती है, के ‍विपरीत, अहिंसक क्रांति के लिए लाखों लोगों की राजनीतिक एकजुटता और अधिकांश बहुमत का सहनशील समर्थन जरूरी था। वह इस आंदोलन के नैतिक और नीतिपरक अभिरक्षक थे और कृतज्ञ राष्ट्र उन्हें राष्ट्रपिता का सम्मान देकर उनकी आवाज पर उनके पीछे चल पड़ा।

स्वतंत्रता सेनानी ऐसे जज्बे से संचालित थे जो असाधारण था। वे राष्ट्र के प्रति प्रेम, अपने साथी नागरिकों के प्रति चिंता और बेहतर भविष्य की इच्छा से प्रेरित थे। वे हमारे राष्ट्र के महानतम मूल्यों- उत्साह और वीरता, बलिदान की भावना, हर प्रकार के अन्याय को उखाड़ फेंकने की इच्छा और एक ऐसे राष्ट्र के निर्माण जहां मनमस्तिष्क भयमुक्त हो और सर गर्व से ऊंचा रहे- के प्रतीक थे। इन साहसी व्यक्तियों ने हमारी राजनीतिक चेतना का मार्गनिर्देशन किया, उसे आकार दिया।

लाला लाजपत राय या भगत सिंह जैसे नेता यह जानते थे कि उत्पीड़न की क्रूरता और पाशविकता अधिकाधिक भारतीयों को अंग्रेजों के विरुद्ध प्रेरित करेगी। वे समझते थे कि उन पर किया गया हर वार भारत में अंग्रेजी राज के कफन की कील साबित होगा। स्वतंत्रता सेनानियों की वैयक्तिक निष्ठा और बहादुरी ने लाखों भारतीयों को राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए उठ खड़े होने को प्रेरित किया। उन्होंने दुखों और पीड़ा का सामना किया क्योंकि वे जानते थे कि इससे लाखों लोग स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रेरित होंगे।

असंख्य साधारण भारतीय इस राष्ट्रीय मंथन में कूद पड़े और बहुतों ने राष्ट्रीय स्वाधीनता की बलिवेदी पर महान व्यक्तिगत बलिदान दिए। हमारी स्वतंत्रता में योगदान देने वाले कई ऐसे व्यक्ति गुमनाम हैं, उनकी गाथा अनसुनी है। जबकि उनके प्रयास जाने माने व्यक्तियों द्वारा किए गए प्रयासों से कतई कम नहीं है। हमारे स्वतंत्रता संग्राम में इस श्रेणी के सेनानी उस जनांदोलन की रीढ़ थे जिसके कारण देश को आज़ादी हासिल हो पाई।

उनकी कहानियां हमारी सामूहिक अंतश्चेतना में सन्निहित हैं। हमारे अनेक सार्वजनिक स्थलों का नामकरण उनके नाम पर किया गया है। वर्षों से, उन्होंने हमारी पुस्तकों, हमारे संगीत, रंगमंच और चलचित्रों को प्रेरित किया है। हमें स्वतंत्रता दिलाने के 70 वर्षों के बाद आज भी भारत के स्वतंत्रता सेनानी हमारी प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं। उनकी स्मृति हमें गर्वान्वित करती है और भारत को एक बेहतर राष्ट्र बनाने की हमारी प्रतिबद्धता को और सुदृढ़ बनाती है।

III

हमारे स्वतंत्रता संग्राम की सर्वाधिक चिरस्थायी विरासत हमारी स्वतंत्रता है। व्यक्ति के रूप में, हमें अपने प्रारब्ध को चुनने की स्वतंत्रता है। हम संप्रभु हैं। लेकिन यह स्वतंत्रता काल्पनिक नहीं है। यह विरासत हमें इस स्वतंत्रता का कारण भी बताती है। हमारा राष्ट्रीय आंदोलन एक समतावादी समाज के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध था और लिंग व जाति के आधार पर किसी भी प्रकार की असमानता, भेदभाव और उत्पीड़न का विरोधी था। इसने स्वयं को महिलाओं और निम्न वर्गों की सामाजिक मुक्ति से संबंधित आंदोलनों और संगठनों के साथ जोड़ा और प्राय: वह इसमें समाहित हो गया। राष्ट्रीय आंदोलन ने लाखों महिलाओं को घर की चारदीवारी से निकाल कर राजनीतिक धरातल पर ला खड़ा किया। जाति आधारित असमानता और उत्पीड़न के विरूद्ध इसके संघर्ष के एक भाग के रूप में अस्पृश्यता उन्मूलन इसकी प्रमुख राजनीतिक प्राथमिकताओं में से एक प्राथमिकता बन गया।

यदि स्वतंत्र भारत एक लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के साथ प्रारंभ हुआ और उसमें बना रहा, तो इसका कारण यह था कि स्वतंत्रता संग्राम लोगों के मन में नागरिक स्वातंत्र्य और लोकतांत्रिक परंपरा की भावना को पहले ही स्थापित कर चुका था। यही वह परंपरा थी जोकि भारतीय संविधान में प्रतिबिंबित होती है।

हमारे स्वतंत्रता संग्राम की एक चिरस्थायी विरासत भारतीय पहचान का निर्माण है। हमारे देश के सभी भागों के लोग भारत के स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुए। औपनिवेशिक शासन के विरूद्ध अपने संघर्ष की प्रक्रिया में उन्हें अपनी एकता की पहचान मिलने लगी। उन्होंने न केवल भारत की समृद्ध सांस्कृतिक, भाषायी, धार्मिक, जातीय और क्षेत्रीय विविधता को स्वीकार किया, अपितु उसकी सराहना भी की। हमारी विविधता और भिन्न-भिन्न पहचान को एक ऐसा अवरोध नहीं माना गया जिस पर काबू पाया जाना है, अपितु इन्हें भारतीय संस्कृति, सभ्यता और राष्ट्र को सुदृढ़ बनाने वाले स्रोत की सकारात्मक विशेषताएं माना गया जोकि उभरते राष्ट्रवाद का अभिन्न हिस्सा थीं।

अपने आरंभिक दिनों से ही, राष्ट्रीय आंदोलन धर्मनिरपेक्षता के प्रति कटिबद्ध था। धर्मनिरपेक्षता को समग्र रूप से परिभाषित किया गया था, जिसका अर्थ धर्म को राजनीति और राज्य से अलग रखना, धर्म को किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला मानना, राज्य का सभी धर्मों के प्रति निरपेक्ष दृष्टिकोण या सभी धर्मों के प्रति समान आदर भावना रखना, विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के प्रति भेदभाव न करना और सांप्रदायिकता का सक्रिय विरोध करना था। महात्मा गांधी ने 1942 में इसे सारगर्भित ढंग से व्यक्त किया था: "धर्म एक व्यक्तिगत मामला है जिसका राजनीति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए।" अन्य अग्रणी नेता सांप्रदायिकता को फासीवाद के एक रूप की तरह मानते थे और उन्होंने भावप्रवणता और गहरी समझ के साथ सांप्रदायिकता के संबंध में अपने विचार व्यक्त किए थे।

तथापि, सांप्रदायिकता की काली ताकतें शक्तिशाली हो गईं जिससे 1947 में भारत का विभाजन हुआ। इस स्तब्धकारी घटना ने सांप्रदायिक नरसंहार की एक लहर को जन्म दिया। इसके बावजूद, राष्ट्रीय आंदोलन की सशक्त धर्मनिरपेक्ष शक्ति के कारण स्वतंत्र भारत धर्मनिरपेक्षता को अपने संविधान के साथ-साथ अपने राज्य और समाज का आधारस्तंभ बनाने में सक्षम हुआ।

विरासतें स्थायी होती हैं, तथापि कोई भी विरासत कितनी भी सशक्त क्यों न हो, चिरस्थायी नहीं होती। यदि इसे मजबूत और विकसित न किया जाए और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप समय-समय पर सृजनात्मक रूप से श्रेष्ठ न बनाया जाए, तो इसका क्षरण होने लगता है और यह अप्रासंगिक हो जाती है। इसी कारण से युवाओं को अपने इतिहास का ज्ञान होना चाहिए - और उन्हें यह जानकारी होनी चाहिए कि उनकी आकांक्षाओं को प्रोत्साहित करने वाले माहौल का निर्माण उनसे पूर्व के व्यक्तियों के त्याग और श्रम से हुआ है।

जय हिंद।