23 जुलाई, 2017को को केंद्रीय कक्ष, संसद भवन में भारत के माननीय राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी के सम्मान में आयोजित विदाई समारोह में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति एवं राज्य सभा के सभापति श्री मो. हामिद अंसारी का अभिभाषण

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नई दिल्ली | जुलाई 23, 2017

माननीय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, या यूँ कहें कि प्रणब दा, जैसा कि लोग उन्हें स्नेह से पुकारते हैं, का सार्वजनिक जीवन में एक लम्बा और उत्कृष्ट कार्यकाल रहा है। विगत पाँच वर्षों से, इन्होंने इस देश के सर्वोच्च पद को सुशोभित किया है और इस पद को गरिमा और प्रतिष्ठा प्रदान की है। हमारे राष्ट्रीय जीवन, संसदीय संस्थानों और राजनैतिक संवाद को समृद्ध बनाने में उनके योगदान को तथा भारत की अवधारणा में उनके अटल विश्वास को अत्यधिक सम्मान से देखा जाता है।

एक सांसद के रूप में, श्री मुखर्जी ने सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर अपनी विद्वतापूर्ण अभिव्यक्ति द्वारा संसद में होने वाले वाद-विवाद के स्तर को बढ़ाने का प्रयास किया। संसद में उनके कार्यों के लिए वर्ष 1997 में उन्हें सवोत्कृष्ट संसद सदस्य के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

उन्होंने एक बार एक टिप्पणी की थी जो अत्यधिक प्रसिद्ध हुई थी:-
“लोकतंत्र में तीन 'डी' अर्थात- डिबेट यानी वाद-विवाद, डिसेन्ट यानी मतभेद और डिसीज़न यानी निर्णय, होने चाहिएं, न कि चौथा'डी'-डिसरप्शन यानी विध्न।"
उनकी यह उक्ति आज के इस कठिन समय में अत्यधिक उल्लेखनीय है।

श्री मुखर्जी के सम्मान में कहीं गयीं बातें अधूरी ही रहेंगी, यदि इस देश की शासन व्यवस्था में उनकी भूमिका का उल्लेख न किया जाए। उन्होंने सरकार में महत्वपूर्ण मंत्री पद धारित किए और वर्षों तक प्रगति और समावेशी विकास हेतु बनायी जानेवाली नीतियों को मूर्त रूप देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विविध अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए वे एक उत्कृष्ट राजनयिक बने रहे। इसी प्रकार आर्थिक और वित्तीय मामलों में उनकी दक्षता अत्यधिक लोकप्रिय रही है। वर्ष 1984 में उन्हें विश्व के पांच सर्वोच्च वित्त मंत्रियों में से एक माना गया और वर्ष 2010 में उन्हें 'एशिया महाद्वीप का उस वर्ष का वित्तमंत्री' घोषित किया गया। अपने सुदीर्घ कॅरिअर के दौरान, उन्हेंने विभिन्न पदों पर रहते हुए एक कुशाग्र प्रशासक और सर्वसम्मति के निर्माता की भूमिका निभाई।

उनकी अमूल्य सेवाओं को मान्यता देते हुए, अपने कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें वर्ष 2008 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया।

श्री मुखर्जी में एक विद्वान और राजनेता दोनों के गुण हैं। राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर उनके विचारों और वक्तव्यों ने उनके द्वारा सुशोभित उच्च पदों की गरिमा में उत्तरोत्तर वृद्धि की हैं। राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद पर रहते हुए, उन्होंने कई अवसरों पर नागरिकों को लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित करने का आग्रह किया है।

उन्होंने बड़े विश्वास के साथ कहा है कि भारत की बहुलता और विविधता इसकी महानतम शक्तियां हैं और उन्हें निरंतर पोषित करने और संरक्षित करने की आवश्यकता है। उन्ही के शब्दों में,

“''हमारी परंपरा में सदैव तर्कपूर्ण' भारतीय का मान हुआ है; 'असहिष्णु' भारतीय का नहीं। हमारे देश में सदियों से भिन्न-भिन्न प्रकार के मत, विचार और दर्शन शांतिपूर्ण तरीके से एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते रहे हैं।"

विगत सप्ताह, राज्यपालों और उप-राज्यपालों की विदाई के अवसर पर आयोजित रात्रिभोज में, राष्ट्रपति मुखर्जी ने संवैधानिक रूपरेखा के बारे में बताते हुए कहा कि 'राज्य में दो कार्यकारी प्राधिकारी कार्य नहीं कर सकते हैं' और इसलिए राज्यपाल की भूमिका 'मुख्यत: मुख्य मंत्री को परामर्श देने तक ही सीमित है'। उन्होंने यह भी कहा कि कतिपय परिस्थियों में राज्यपाल के पास सभा में इस विश्वास-मत के परिणाम को स्वीकार करने के अतिरिक्त स्वविवेक की कोई गुंजाइश नहीं होती'। उन्होंने राज्यपालों को परामर्श दिया कि वे राज्यों में अनुसूचित जनजातीय क्षेत्रों के संबंध में अपने संवैधानिक उत्तरदायित्वों का कर्मठता से निर्वहन करें।

श्री मुखर्जी की संपन्न राजनीतिक विरासत में हमारे लिए कई मूल्यवान सीखें निहित हैं जो सार्वजनिक जीवन में भावी पीढ़ी का मार्गदर्शन करेंगी।

आज जब हम राष्ट्रपति जी को विदाई दे रहे हैं, मैं उनके अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन की कामना करता हूं।
जय हिंद।