6 अगस्त 2017 को बंगलुरू में राष्ट्रीय लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (एनएलएसयूयू) के 25वें वार्षिक दीक्षांत समारोह में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री मो. हामिद अंसारी द्वारा दिया गया भाषण

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बंगलुरू | अगस्त 6, 2017

दो अपरिहार्य सिद्धांत :
अनेकतावाद और धर्मानिरपेक्षवाद हमारे लोकतंत्र के लिए अनिवार्य क्यों हैं

देश के सबसे प्रतिष्ठित लॉ स्कूल में आमंत्रित किया जाना मेरे लिए सौभाग्य की बात है विशेषकर इसलिए क्योंकि मुझे विधिशास्त्र का कोई औपचारिक ज्ञान नहीं है। मैं इस सम्मान के लिए निदेशक महोदय और संकाय सदस्यों का धन्यवाद करता हूं।

यहां मौजूद श्रोतागण विधि और विधिक प्रक्रियाओं के गूढ़ संसार से सुपरिचित हैं और मेरे पास उनसे कहने के लिए ऐसी बहुत कम बातें हैं जोकि प्रासंगिक हों। समझदारी इसी में है कि मैं यहां श्री बम्बल की टिप्पणी कि "कानून एक मूर्खता है" या हेनरी चतुर्थ में शेक्सपियर द्वारा रचित एक पात्र के इस भयावह प्रस्ताव को' कि 'सभी वकीलों को मार डाला जाना चाहिए' जैसी बातें न दोहराऊं। इसके बजाय, आज मेरा प्रयास नागरिकों के जीवन में कतिपय संवैधानिक सिद्धांतों, विधिक आदेशों और न्यायिक घोषणाओं के व्यावहरिक निहितार्थों की जांच करना होगा।

राजनैतिक दर्शन के प्रति मेरा रूझान सदैव रहा है। मुझे जॉन लॉक की यह उक्ति स्मरण आती है कि 'जहां कानून समाप्त होता है वहीं से निरंकुशता शुरू होती है।' साथ ही जॉन राउल्स की यह टिप्पणी भी स्मरणीय है कि न्याय सामाजिक संस्थाओं की प्रथम विशेषता है और 'एक न्यायपूर्ण समाज में समान नागरिकता के अधिकार निश्चित होते हैं और न्याय द्वारा प्राप्त अधिकार राजनीतिक सौदेबाजी अथवा सामाजिक हित के परिकलन के अध्ययीन नहीं होते"। राउल्स के अनुसार, राजनीतिक दर्शन का प्रथम कार्य उसकी व्यावहारिक भूमिका में यह देखना होता है कि क्या अत्यधिक विवादित प्रश्नों के संबंध में प्रकट स्थितियों के बावजूद नागरिकों के बीच परस्पर सम्मान की नींव पर सामाजिक सहयोग को बढ़ाने के लिए कतिपय दार्शनिक अथवा नैतिक आधारों की तलाश संभव है?2

भारत का संविधान और उसकी उद्देशिका उन आदर्शों और सिद्धांतों का साकार रूप है जिन्हें मैं अत्यधिक महत्व देता हूं।

II

भारत की जनता ने स्वयं को सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य और एक ऐसी संवैधानिक प्रणाली आत्मार्पित की है जो न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व पर केंद्रित है। इन्हें कई संस्थाओं और विधियों, अभिसमयों और परिपाटियों के ढांचे में साकार रूप दिया गया है।

हमारे संविधान निर्माताओं के संज्ञान में एक अस्तित्वपरक वास्तविकता थी। हमारा समाज वैविध्यपूर्ण समाज है और हमारी संस्कृति एक ऐसी संस्कृति है जिसमें व्यापक परिमाण में समन्वयवाद व्याप्त है। हमारी 1.3 अरब की जनसंख्या में 4,635 से अधिक समुदाय हैं, जिनमें से 78 प्रतिशत भाषाई और सांस्कृतिक वर्ग के साथ-साथ सामाजिक श्रेणियां भी हैं। धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग, कुल जनसंख्या का 19.4 प्रतिशत है। मानव विविधताएं दोनों प्रकार की हैं - ऊँच-नीच पर आधारित और स्थानीयता पर आधारित।

इस विविधता को संविधान ने एक लोकतंत्रात्मक राज्य व्यवस्था और पंथनिरपेक्ष राज्य संरचना से नवाज़ा है। एक नैतिक मूल्य के रूप में अनेकतावाद का उद्देश्य सामाजिक अनेकता को राजनीतिक स्तर पर लाना और ऐसी व्यवस्थाओं का सुझाव देना है जिससे अनेकता की अभिव्यक्त्िार एक ऐसी एकल राजनैतिक प्रणाली में हो जिसमें विधिवत रूप से गठित सभी समूहों और सभी व्यक्तियों को समान दर्जा प्राप्त हो, जो उन्हें प्राप्त समान विधिक अधिकारों से परिलक्षित हो। इस आधुनिक अर्थ में अनेकतावाद, नागरिकता की पूर्व-शर्त है। 3

यद्यपि राष्ट्रीय पहचान कतिपय नाजुक, जटिल और 'राष्ट्रिक-नागरिक-मिश्रित-जातीय' संयोजनों से लगातार ग्रस्त अवधारणा रही है तथापि एक मूल इकाई के रूप में नागरिकता की संकल्पना "राष्ट्रिक-जातीय के स्थान पर राष्ट्रिक-नागरिक" के रूप में की गई है। इसी प्रकार, भारतीयता को एकल अथवा संपूर्ण पहचान के रूप में नहीं अपितु अनेक परतों वाली भारतीयता के विचार का मूर्त रूप, कई पहचानों के संचयन के रूप में परिभाषित किया गया। 5

' आधुनिक लोकतंत्र में मानव इतिहास की सर्वाधिक समावेशी राजनीति की संभावना है। इसी तर्क से अपवर्जन पर भी बल दिया जा रहा है जो लोकतांत्रिक समाजों में संसंजन की आवश्यकता का ही एक अन्य स्वरूप है, अत: परिणामस्वरूप राजनीतिक व्यवस्था में रहने के इच्छुक/रहने को बाध्य विभिन्न व्यक्तिगत एवं सामूहिक पहचानों के बीच साझा स्वीकार्य राजनीतिक पहचान हेतु आपसी संवाद द्वारा अपनी साझा पहचान बनाने के जरिए, अपवर्जन से 'सृजनात्मक' ढंग से निपटने की आवश्यकता होती है। लोकतंत्र का आकलन केवल ऐसी संस्थाओं के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए जो औपचारिक रूप से अस्तित्व में हैं अपितु इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वास्तव में जनता के विविध वर्गों की विभिन्न अवधारणाओं को कहां तक महत्व दिया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य दूसरों के अस्तित्व को स्वीकार करना है।’ 7

III

एक अवधारणा और एक राजनीतिक साधन के तौर पर धर्मनिरपेक्षता पर विस्तृत बहस की गई है। इस संबंध में भारत में शासन कला के प्रयोजनार्थ उच्चतम न्यायालय द्वारा एक निर्णायक निर्णय बोम्मई मामले में किया गया था, जो निम्नानुसार पुन: उद्धृत है:

‘धर्मनिरपेक्षता में सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों प्रकार की विषय-वस्तु निहित हैं। संविधान सांसारिक भागों में एक संतुलन बनाते हुए इसे किसी धर्म-विशेष में श्रद्धा या विश्वास रखने वाले व्यक्ति तक सीमित करके इसके बौद्धिक भागों में संतुलन स्थापित करता है और उसे लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए अपने धर्म को मानने, आचरण और प्रचार करने की अनुमति देता है। धर्मनिरपेक्षता का सकारात्मक पक्ष राज्य को सौंपा गया है ताकि वह विधि या किसी कार्यकारी आदेश के द्वारा इसे विनियमित करे। राज्य के लिए किसी धर्म-विशेष को राज्य के धर्म के रूप में संरक्षण देना निषिद्ध किया गया है और उसे धर्म निरपेक्ष रहने का आदेश दिया गया है। राज्य यह सुनिश्चित करने के लिए इस प्रकार का संतुलन स्थापित करता है कि उसकी जनता में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास का माहौल हो, कोई व्यक्ति अपने व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर सके और उसे धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को अपनाने वाला मनुष्य बनाया जा सके, ताकि प्रत्येक व्यक्ति की उत्कृष्टता में सुधार हो, क्षेत्रीय विकास, प्रगति और राष्ट्रीय एकता को बेहतर बनाया जा सके।... राष्ट्रीय एकता और पंथ या धार्मिक एकता के लिए धार्मिक सहिष्णुता और भाईचारा संविधान की मौलिक विशेषता और एक स्कीम के रूप में आधार-तत्व हैं। राजनीतिक दलों द्वारा धर्म के आधार पर तैयार किए गए कार्यक्रम या सिद्धांत धर्म को राजनीतिक अभिशासन के एक भाग के रूप में मान्यता देने के समान हैं जिसे संविधान ने स्पष्ट रूप से निषिद्ध किया है। यह संविधान की मूल भावना का उल्लंघन करता है। सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता इस प्रकार की किसी नीति को नकारती है और इसे किसी भी प्रकार से बढ़ावा देने वाली कोई भी कार्रवाई संविधान की मूल भावना का उल्लंघन करेगी।’ 9

यह बात सुस्पष्ट होने के बावजूद, इसके महत्व को कमज़ोर करने और इसके नए अर्थ निकालने के लिए विभिन्न न्यायिक और राजनीतिक प्रयास किए गए हैं। विश्वसनीय आलोचकों का मानना है कि उच्चतम न्यायालय की पीठ का 11 दिसम्बर, 1995 का निर्णय 'धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के सिद्धांत का अनादर करता है' और एक बड़ी पीठ को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए और 'इस निर्णय द्वारा हुई क्षति का निराकरण करना चाहिए।' ऐसा किया जाना अभी बाकी है; 'बजाय इसके, अंत:करण में प्रतिगमन की भावना भर रही है' और 'इसे और गति देने का प्रयास किया जा रहा है और यह 'सर्वधर्म समभाव' में समाहित राष्ट्रीय आंदोलन से हुए लाभ को भी समाप्त करने के लिए एक खतरा बन गई है।’12

न्यायोचित रूप से यह अनुभव किया गया है कि 'समरूपता और असमानता भारत में धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के केन्द्र में हैं।' इसलिए आज धर्मनिरपेक्षता के मूल सिद्धांतों: समानता, धर्म की स्वतंत्रता और सहिष्णुता को दोहराने और उनका पुनरुद्धार करने की चुनौती बनी हुई है और इस बात पर बल देने की आवश्यकता है कि समानता स्थायी होनी चाहिए, यह कि धर्म की स्वतंत्रता को इसके समावेशी पहलुओं के साथ अपने चित्त में पुन:धारण किया जाए, और यह कि सहिष्णुता भारतीय समाज में वास्तविक अर्थ में प्रतिबिंबित हो और इसे अपनाया जाए।14

IV

लगभग सात दशकों का अनुभव बताता है कि हम इन मूल्यों और लक्ष्यों को वास्तविक रूप देने में कितने सफल हुए हैं और हमारी क्या-क्या सीमाएं रही हैं। इसका सकारात्मक पक्ष यह कहता है कि इसकी जड़ें गहरी हुई हैं; इसका नकारात्मक पक्ष इसके पतन अथवा इसके संकटग्रस्त होने की ओर संकेत करता है।15

अतएव मस्तिष्क में तीन प्रश्न आते हैं:

  • हमारी राज्यव्यवस्था की मूलभूत बहुलता भारतीय लोकतंत्र के कार्यकरण में स्वयं को किस प्रकार प्रतिबिंबित करती है?
  • लोकतंत्र ने भारतीय बहुलता के विभिन्न पहलुओं में किस प्रकार योगदान दिया है?
  • हम किस सीमा तक धर्मनिरपेक्षता का दृढ़ता से अनुपालन कर रहे हैं?

हमारी लोकतांत्रिक राज्य-व्यवस्था इस लिए बहुलतावादी है क्योंकि यह (क) अपने संघीय ढांचे में, (ख) अल्पसंख्यकों के भाषायी और धार्मिक अधिकारों में, और (ग) व्यक्तिगत अधिकारों के समुच्चय में इस बहुलता को मान्यता देती है और उसका समर्थन करती है। पहला क्षेत्रीय दबावों को सफलता के विभिन्न सोपानों में नियंत्रित करता है, दूसरा धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों को उनका समुचित स्थान देना सुनिश्चित करता है और तीसरा विचारों की स्वतंत्रता और विसम्मति के अधिकारों का संरक्षण करता है।

राष्ट्रीय एकीकरण के बारे में प्राय: एक प्रश्न उठाया जाता रहा है। अवधारणात्मक एवं व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो एकीकरण समावेशन या समरूपण का समानार्थी नहीं है। कुछ वर्षों पहले, एक राजनीतिवेत्ता ने इसकी बारीकियों के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा था:

'व्यावहारिक राजनीति के संदर्भ में राष्ट्रीय एकीकरण का तात्पर्य संसक्ति न कि विलयन, एकता न कि एकरूपता, सुलह न कि मेल, अनुकूलन न कि विनाश, संश्लेषण, न कि विधटन, एकजुटता न कि व्यापक राजनीतिक समुदाय के अनेक अलग-अलग वर्गों का विबंधन है और होना ही चाहिए .... अत: यह स्पष्ट है कि एकीकरण विविधताओं के एकरूपता में रूपांतरण की एक प्रक्रिया न होकर विविधताओं का सामंजस्य भर है जिससे एकता स्थापित होती है और जिसमें विविधता और समरूपता दोनों ही विद्यमान रहते हैं।'16

भारतीय लोकतंत्र के मामले में अक्सर साथ-साथ चलने वाले और अलग-अलग वर्गों का निर्माण करने वाले वर्गीकरण, विविधता और तारतम्यता से उत्पन्न होने वाले पृथक्करणों की वास्तविकता के साथ यह कैसे और कितना कारगर रहा है।17

व्यापक रूप से व्याप्त असमानताओं और सामाजिक विविधताओं को देखते हुए एक ऐसे तंत्र का चयन जो राजनीतिक समावेशिता के लिए प्रतिबद्ध हो, स्वयं में 'अनिश्चितता में विश्वास' जैसे था। संविधान ने सबको वयस्क मताधिकार दिया एवं जो बहुमत की जीत (फर्स्ट पास्ट द पोस्ट) (वेस्टमिंस्टर) मॉडल के आधार पर प्रतिनिधित्व की प्रणाली स्थापित की। कानून सम्मत शासन उसका अंतर्निहित आधार था जो सत्ता की जवाबदेह, शासन को न्यायसंगत और राज्य को नीतिसंगत बनाने की लोगों की इच्छा को परिलक्षित करता था।18

काफी पहले गांधी जी ने भविष्यवाणी की थी कि लोकतंत्र को तब सुरक्षित बनाया जा सकेगा यदि जनता में 'स्वतंत्रता, आत्म-सम्मान तथा उनकी एकता की सच्ची भावना हो और वे केवल ऐसे लोगों को अपने प्रतिनिधि चुनने पर ज़ोर दें, जो अच्छे हों और सच्चे हों।' इसे अंबेडकर की इस आशंका ने कि 'एक व्यक्ति, एकमत एक समान महत्व का आदर्श प्राप्त न होने की स्थिति में समानता और बंधुत्व की गैर-मौजूदगी से 'एक' विरोधाभासपूर्ण समाज' उत्पन्न हो सकता है, के साथ पढ़े जाने पर यह लोकतंत्र द्वारा पैदा की गई चुनौती को रेखांकित करता है।

हमारे लोकतंत्र के कार्यकरण का कोई भी मूल्यांकन प्रक्रियात्मक एवं वास्तविक दोनों तरह से किया जाना होगा। प्रक्रियात्मक दृष्टि से इस तंत्र ने नियमित चुनावों, निर्वाचन प्रणाली की प्रभावकारिता, चुनावी प्रक्रिया में मतदाता प्रतिभागिता और इस प्रकार से निर्वाचित विधानपालिकाओं के औपचारिक कार्यकरण की निरंतर बढ़ती प्रतिशतता के साथ अपनी जड़ें मजबूत की है। अभिलेख के अनुसार अत्यधिक संतुष्ट होना लाज़मी है।

वास्तविक परिदृश्य में परिणाम अधिक उत्साहवर्धक नहीं है। इन पांच चीज़ों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है - (क) 'कानून के समक्ष समानता' और 'कानून का समान संरक्षण' के बीच का अंतर, (ख) निर्वाचित प्रतिनिधियों का प्रतिनिधित्व, (ग) विधानपालिकाओं का कार्यकरण, (घ) स्त्री-पुरुष व विविधता असंतुलन और (ड.) व्यवहार में पंथनिरपेक्षता:-

  • 'कानून के समक्ष समानता और कानून का समान संरक्षण: समानता प्राप्त करने के प्रयास दो स्तरों पर किए गए हैं। एक स्तर पर सामाजिक संबंधों की मूल संरचना को परिवर्तित करने का संवैधानिक प्रयास था जहां जाति और अस्पृश्यता का प्रयोग अवैध कर दिया गया और राज्य के कार्यकलापों को प्रभावित करने के लिए धार्मिक विवेचन के प्रयोग की अनुमति नहीं दी गई। दूसरे स्तर पर, प्रयास आर्थिक समानता लाने का था, यद्यपि इस प्रयास में संपत्ति के अधिकार तथा वर्ग असमानता पर गंभीरता से अंकुश नहीं लगाया गया....इस प्रकार संविधान में, न्यायालयों में अथवा राजनीतिक मंचों से आर्थिक समानता का उल्लेख मुख्यत: आलंकारिक ही रहा।'’ 19
  • निर्वाचित प्रतिनिधि का प्रतिनिधित्व: 2014 के आम चुनाव में 61 प्रतिशत निर्वाचित संसद सदस्यों को कुल मतों के 50% से कम मत प्राप्त हुए। कुछ हद तक इसका कारण विबंधित राज व्यवस्था और दलों और उम्मीदवारों की बहुमत के आधार पर विजय प्रणाली हो सकती है। तथापि, तथ्य तो यही है कि गैर-बहुमत के आधार पर प्राप्त किया गया प्रतिनिधित्व उस समग्र दृष्टिकोण को अवश्य प्रभावित करता है जिसमें पहचान की राजनीति साझा हितों पर हावी रहती है।21
  • विधानपालिकाओं का कार्यकरण, जवाबदेही और अनुक्रियाशीलता: विधायकों का प्राथमिक उद्देश्य कानून बनाना, कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित कराना, शिकायतों को व्यक्त करना और जन सरोकार के मुद्दों पर चर्चा करना है। ये तीनों प्राय: अतिव्याप्त होते रहते हैं, सभी को समुचित समय की आवश्यकता रहती है। बाद वाली बात चिंता का विषय है। लोक सभा और राज्य सभा की बैठकों की संख्या जो 1953 में क्रमश: 137 और 100 थी, 2016 में घटकर 49 और 52 रह गई। इस तरह से हुई समय की कमी का परिणाम इनमें से प्रत्येक को उपलब्ध दायरे के कम होते जाने में निकलता है जिसका परिणामी प्रभाव गुणवत्ता एवं उत्पादकता तथा कार्यपालिका की जवाबदेही में तदनुसार कमी पर पड़ता है। कुछ वर्षों पूर्व किए गए एक आकलन के अनुसार, लोक सभा में 40 प्रतिशत से अधिक विधेयक एक घंटे से भी कम हुई बहत में पारित किए गए थे। राज्य सभा में स्थिति थोड़ी से बेहतर है। लोक नीति से संबंधित्‍ मुद्दों पर सारभूत बहस बहुत कम हुई है। अभी हाल ही में, स्थायी समिति संबंधी प्रणाली की प्रभावकारिता को भी महत्वपूर्ण साक्षियों द्वारा बचाव की रणनीति का सहारा लिऐ जाने के कारण नुकसान पहुंचा है। 'जवाबदेही के माध्यम के रूप में भारतीय संसद' विषय पर किए गए एक अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला गया था कि यह संस्था 'सरकार की कार्यपालिका शाखा पर निगरानी रखने में दिनों दिन प्रभावहीन होती जा रही है।' 23
    राज्य विधानसभाओं के कार्यकरण के संबंध में तस्वीर, सामान्यत: और भी खराब है।
    इस तरह, एक ओर जहां निर्वाचन प्रक्रिया में जन भागीदारी में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी ओर निर्वाचित निकायों के कामकाज के प्रति सार्वजनिक संतोष स्वयं लोकतांत्रिक प्रक्रिया में निराशावाद उत्पन्न कर रहा है। यह भी तर्क दिया जाता रहा है कि 'समय आ गया है कि हम अपने आपको और गहन तथा अधिक सहभागितापूर्ण और विकेन्द्रीकृत लोकतंत्र - एक ऐसा लोकतंत्र जहां जनता के हितों और लोक नीति का और बेहतर समामेलन हो - के प्रति और अधिक प्रतिबद्ध करें।'’24
  • • लिंग और विविधता संबंधी असंतुलन: वर्ष 2014 में महिला सांसदों की संख्या कुल सदस्य संख्या का 12.15 प्रतिशत थी। यह प्रतिशतता वैश्विक रूप से और दक्षेस में भी तुलनात्मक रूप से कम है और यह व्यापक नव-पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण को परिलक्षित करता है। राज्य सभा द्वारा पारित 2009 के महिला आरक्षण विधेयक को लोक सभा में चर्चा के लिए लिया ही नहीं गया और 2014 में आम चुनावों के पूर्व लोक सभा को भंग किए जाने पर वह विधेयक व्यपगत हो गया। इसे दोबारा नहीं लाया गया। कुछ ऐसी ही स्थिति (समझ और पूर्वाग्रह के अन्य कारणों से) अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के साथ भी है। मुसलमान भारत की जनसंख्या का 14.23 प्रतिशत हैं। संसद के दोनों सदनों की कुल संख्या 790 है; 1980 में मुसलमान संसद सदस्यों की संख्या 49 थी, 1999 से 2009 की अवधि के दौरान यह संख्या 30 से 35 के बीच रही किंतु 2014 में यह घटकर 23 हो गई।
    कुछ वर्षों पूर्व सरकार की एक विशेषज्ञ समिति ने ऐसे 'असमानता फंदों' की पहचान करने के लिए विविधता सूचकांक' की आवश्यकता पर बल दिया था जो कमजोर तबकों पर अंकुश लगाते हैं और समाज के वर्चस्वशाली समूहों के पक्ष में कार्य करते हैं और जिसका परिणाम राजनीतिक सत्ता की असमान उपलब्धता के रूप में हेाता है, जो इसके संस्थाओं एवं नीतियों के स्वरूप और कार्यकरण का निर्धारण करती है। 25
  • वास्तविक व्यवहार में पंथनिरपेक्षता: अनुभव यह दर्शाता है कि पंथनिरपेक्षता राजनीति और कानूनी लड़ाई का एक अखाड़ा बन गई है। दिक्कम है लोक नीति एवं आचरण के प्रयोजनों के लिए उस रेखा का निरुपण करने की जो उन्हें धर्म से अलग करती है। क्योंकि इस धर्म को ही और इस बातचीत को उल्लिखित प्रत्येक वैयक्तिगत धर्म को वर्णित विशेषताओं के रूप में परिभाषित किया जाना होगा। दार्शनिक पुस्तकों में और कतिपय न्यायिक घोषणाओं में प्रयुक्त 'जीवन दर्शन' तर्क बहु-धार्मिक समाज में समता के साझा सिद्धांतों की पहचान की प्रक्रिया में सहायता नहीं करता जिसमें धार्मिक बहुमत का तात्पर्य नागरिक निकाय की समग्रता नहीं है। चूंकि भारतीय स्थितियों में विभाजन की एक दीवार संभव नहीं है, समाज दूरी और न्यूनतम सहभागिता के लिए एक सूत्र बनाना और उसे लागू करना चुनौती है। इस प्रयोजन के लिऐ विश्वास के सिद्धांतों को संस्कृति की रूपरेखा से अलग किए जाने की आवश्यकता है चूंकि दोनों का सम्मिश्रण दोनों की सीमाओं को अस्पष्ट करता है और संदिग्घता की गुंजाइश उत्पन्न करता है। इसके अतिरिक्त, ऐसा तर्क इस देश के अइन्य धार्मिक, विश्वास भी अपना सकते हैं क्योंकि अभी एक सांस्कृतिक वातावरण का दावा करते हैं और उनके पास इसके लिऐ एक ऐतिहासिक औचित्य भी है।

कानून के समान ही, जीवन में भी पारिभाषिक अशुद्धता के निहितार्थ होते हैं। चुनावी संदर्भ में, 'बहुमत' संख्यात्मक बहुमत है, जैसा किसी विशेष कार्य में परिलक्षित होता है। (उदाहरणत: चुनाव), जिसमें स्थायित्व नहीं होता और सामान्यतया निश्चित समय से जुड़ा होता है, यही बात 'अल्पमत' के साथ है। दोनों ही मूल्य-निर्णयों में स्थान पाते हैं। सामाजिक-राजनीतिक शब्दावली में (उदाहरण जनसांख्यिकी आंकड़े), 'बहुमत' एवं 'अल्पमत' स्थिर परिस्थितियों का संकेत देने वाले शब्द हैं। ये दोनों भी मूल्य-निर्णयों को प्रस्तुत करते हैं। सवाल यह है कि क्या अधिकारों और कर्तव्यों के संबंध में स्पष्ट व्यादेश रखने वाले हमारे संविधान के अंतर्गत 'नागरिकता' के संबंध में 'बहुसंख्यक और' 'अल्पसंख्यक' तथा संबंधित विशेषणों जैसे 'बहुसंख्यक' 'बहुसंख्यकवाद' तथा 'अल्प संख्यक' और 'अल्पसरचकवाद' जैसी अभिव्यक्तियों से कोई मूल्यपरक निष्कर्ष निकलता है? अभिलेख यह दर्शाता है कि इनके विभाजनकारी निहितार्थ है और ये 'बंधुत्व' संबंधी प्रस्तावना के प्रयोजन से विपथित करते हैं।

अनुच्छेद 14,15 और 16 द्वारा परिवर्द्धित, स्थिति तथा अवसर की समानता का संवैधानिक सिद्धांत इसी दायरे में आता है, परंतु यह इससे भिन्न है। ऐसी समानता मात्र औपचारिक नहीं, बल्कि ठोस रूप में होनी चाहिए और प्रत्येक मामले में आवश्यक अपेक्षित सकारात्मक कार्रवाई के माध्यम से इसे साकार किया जाना चाहिए ताकि विकास के पथ की यात्रा का प्रस्थान बिंदु समान हो। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीजी की नीति सबका साथ सबका विकास को साकार करने के लिए यह प्रभावी तरीका होगा।

न्यायापालिका की भूमिका यहीं से प्रारंभ होती है और जैसा कि संविधान के जाने-माने विशेषज्ञ ने कहा है, "जब तक न्यायालय हर संभव तरीके से यह आश्वस्त करने का प्रयास नहीं करता है कि संविधान और विधि सभी नागरिकों के लिए समान है, तो ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि न्यायालय ने संरक्षक संबंधी अपना दायित्व निभाया है।"27

V

इस स्थिति में हम बहुलतावाद और धर्मनिरपेक्षता के दो उद्देश्यों की व्यापक स्तर पर पूर्ति हेतु तथा संविधान में वर्णित लोकतांत्रिक उद्देश्यों की व्यापक स्तर पर पूर्ति के ताने बाने में इन्हें जोड़ने हेतु परिस्थितियां और अवसर कैसे पैदा करते हैं?

प्रथमत: इसका समाधान संस्थाओं और नागरिकों में विविधता के समावेश की बाधाओं को नकारने में प्रतीत होता है इसका उत्तर मिथ्या प्रतीत होगा और द्वितीयत: ऐसी संस्थाओं और प्रचलनों को पुनरूज्जीवित करने में प्रतीत होता है जिसके माध्यम से बहुलतावाद और धर्मनिरपेक्षता भारतीय लोकतंत्र के कार्यकरण में राजनीतिक-वैधानिक प्रतिरोध नहीं रह जाते हैं। ये दोनों दृष्टिकोण क्रमिक नहीं बल्कि समानान्तर रहने चाहिए। इन दोनों के लिए संवाद की जटिलता अथवा राज्य की परिपाटी में व्यक्तिगत झुकावों में जटिलता को दूर करने की आवश्यकता है। अनुच्छेद 51क(ड.) और (च) के परिप्रेक्ष्य में बंधुता और हमारी समेकित संस्कृति को और अधिक प्रयास करके संवर्धित करने की नितांत आवश्यकता है। नेताओं और उनके समर्थकों द्वारा व्यवहार रूप में इसे किए जाने की आवश्यकता है।

सहिष्णुता की वकालत एक सामान्य सुझाव है। सहिष्णुता एक सद्गुण है। यह कट्टरता से मुक्ति है। यह विभिन्न धर्मों राजनीतिक विचारों, राष्ट्रीयताओं, जाति समूहों या अन्य हमारे और उनके बीच मतभेदों के मध्य विरोधरहित समाज के कार्यकरण एक व्यवहारिक सूत्र भी है।

तथापि केवल सहिष्णुता समावेशी और बहुलतावादी समाज के निर्माण हेतु पर्याप्त मजबूत आधारशिला नहीं है। इसके साथ-साथ समझ और स्वीकार्यता भी होनी चाहिए। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि हमें "न केवल अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णु होना चाहिए, बल्कि उन्हें सकारात्मक रूप से स्वीकार भी करना चाहिए क्योंकि सत्य सभी धर्मों का आधार है"।

स्वीकार्यता सहिष्णुता से आगे का कदम है। सहिष्णुता से स्वीकार्यता की ओर अग्रसर होना एक ऐसी यात्रा है जो हमारी अपनी, हमारी भीतरी समझ और ऐसे लोगों, जो हमसे भिन्न हैं, के लिए दया से शुरू होती है और 'अन्य' की मान्यता तथा उनकी स्वीकार्यता, जो लोकतंत्र की तर्कसंगतता है, से प्रारंभ होती है। हमारे सामने चुनौती यह है कि हम अन्य की स्वीकार्यता का निषेध करने वाले पुराने विचारों और पूर्वधारणाओं से ऊपर उठें। इसके लिए सतत संवाद अनिवार्य हो जाता है। विभिन्न वर्गों की विविधताओं से परे सद्भाव को बढ़ावा देना एक अनिवार्य राष्ट्रीय गुण होना चाहिए। सार्वजनिक क्षेत्र में विभिन्न सुझावों के माध्यम से राष्ट्रीय, राज्यीय और स्थानीय स्तर पर इसे व्यावहारिक रूप देने की तत्काल आवश्यकता, हमारे नागरिक निकाय, विशेषकर दलितों मुस्लिमों और ईसाइयों में असुरक्षा के बढ़ते डर द्वारा उजागर होती है।

यद्यपि इसका विकल्प अरुचिकर है तथापि उसे साकार किया जाना चाहिए। इस बात का साक्ष्य है कि हम ऐसी राज्य व्यवस्था हैं जो अपने आप से लड़ रही है और जिसमें भावनात्मक एकता की प्रकिया डगमगा गयी है एवं इसमें पुन: उत्साह भरने की अत्यधिक आवश्यकता है। एक ओर यह विधिसम्मत शासन के प्रति हमारी प्रतिबद्धता का प्रश्न है, जिससे ऐसा लगता है कि देश की संस्थाओं की कार्यकुशलता में प्रत्यक्ष कमी, मनमाने ढंग से निर्णय लेने, यहां तक कि भीड़तंत्र और भीड़ द्वारा शासन के कारण गंभीर संकट में है, जिसके परिणामस्वरूप लोगों का मोह भंग होता है, वहीं दूसरी ओर हमारी प्रवृत्तियों से उद्भूत भग्नता और एकजुटता के प्रश्न हैं जिसने हमारी राजनैतिक बहस को मात्र विकासपरकता से सकारात्मक कार्रवाई की कोलाहलपूर्ण मांगों और उग्र विरोध की राजनीति ओर धकेल दिया है। 'मौन की संस्कृति में विरोध का प्रादुर्भाव हुआ है'। विभिन्न राज्यों के कृषि क्षेत्र में मुखर क्लेश, नक्सल उग्रवाद का जारी रहना, भाषा संबंधी पहचान के प्रश्नों का पुन:प्रकट होना, समाज के कमजोर तबकों पर होनेवाली ज्यादतियों के प्रति उदासीनता और स्थानीय राष्ट्रवाद के अबतक नहीं सुलझाए गए दावों को अब और दरकिनार नहीं किया जा सकता अथवा उन्हें दबाया नहीं जा सकता है। जम्मू कश्मीर के संबंध में राजनीतिक शिथिलता निराशाजनक है। इसके साथ ही हमारे तथाकथित 'विषय संघ' के कार्यकरण और विभिन्न स्वरूपों में 'नैतिक वैधता' के संकंट से निपटने के लिए भारत संघ के ढांचे के संबंध में एक व्यापक, नई उर्जायुक्त दृष्टिकोण हेतु महसूस की जा रही आवश्यकता' के संबंध में प्रश्न भी उठ रहे हैं।28

VI

पूर्व में मैंने दो 'वादों', दो मूल प्रणालियों तथा उन्हें शब्द और कृत्य दोनों ही तरह से अधिक प्रतिबद्ध बनाने की अत्यधिक आवश्यकता पर चर्चा की है, ताकि संविधान के सिद्धांतों और उससे उत्पन्न होने वाली संरचना को नई ऊर्जा प्राप्त हो सके। अब मैं एक तीसरे 'वाद' का उल्लेख करना चाहता हूं जो आधुनिक राज्य के लिए एक बुनियादी आवश्यकता है। इसकी व्युत्पत्ति हाल ही में नहीं हुई है परंतु आज इसको अत्यधिक बढ़ा-चढ़ा कर प्रदर्शित किया जा रहा है। मैं यहां राष्ट्रवाद के विषय में बात कर रहा हूं। p>

विद्वानों ने इस विचार के क्रमिक विकास पर विचार विमर्श किया है। भारतीय पहचान की एतिहासिक पूर्वापेक्षा इसका एक घटक थी; इसी प्रकार क्षेत्रीय और उपनिवेश विरोधी देशभक्ति भी उसके घटक थे। 1920 के दशक तक बहुवादी राष्ट्रवाद का एक ऐसा स्वरूप सामने आया, जिसने उस प्रश्न का समाधान किया कि क्षेत्रीय देशी संस्कृतियों और धार्मिक समुदायों पर आधारित पहचानों की विविध महत्वाकांक्षाओं को उसमें कैसे समाहित किया जाए। कुछ वर्ष पूर्व रबींद्रनाथ ठाकुर ने राष्ट्र के प्रति भक्ति (आइडोलेट्रा ऑफ नेशन) पर अपने विचार अभिव्यक्त किए थे'।.30

स्वतंत्रता के पश्चात अनेक दशकों तक राष्ट्रवाद और भारतीयता का एक बहुवादी दृष्टिकोण जिसमं् समावेशिता और 'सैलड बोल' दृष्टिकोण (वह स्थित जिसमें मिली जुली विचारधाराएं और संस्कृतियां एक साथ मौजूद हो) का सबसे व्यापक स्वरूप परिलक्षित होता था, हमारे विचारों की विशेषता थी। हाल ही में 'पृथकतावाद के अपमार्जन' का एक वैकल्पिक विचार हमारे राजनैतिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में घुसकर हम पर हावी होने की चेष्टा कर रहा है। इसका एक स्वरूप 'एक बढ़ती दुर्बल राष्ट्रीय दम्भ के रूप में सामने आया है जो किसी भी असहमति, भले ही वह कितनी ही अहानिकर क्यों न हों, को नियम विरूद्ध घोषित करने की धमकी देता। अति-राष्ट्रवाद और मस्तिष्क का बन्द होना 'संसार में अपनी जगह के प्रति असुरक्षा की भावना का प्रकटीकरण' भी है। 32

यद्यपि बाह्य और घरेलू सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का अनिवार्य कर्तव्य है, तथापि यह प्रतीत होता है कि शक्ति पर अत्यधिक बल देने की वर्तमान प्रवृत्ति के कारण हम दो शताब्दियों पहले जॉर्ज वॉशिंगटन द्वारा अपने देशवासियों को दी गई उस चेतावनी को नजरअंदाज कर रहे हैं, जहां उन्होंने कहा था कि "आवश्यकता से अधिक विकसित सैन्य संस्थापन.... : किसी भी प्रकार के शासन के तहत, स्वतंत्रता के लिए अमंगलकारी होता है।’33

नागरिकता का तात्पर्य राष्ट्रीय दायित्वों से नहीं है। इसमें राष्ट्र की संपूर्ण समृद्ध विविधता के प्रति निष्ठा और स्नेह रखने की अनिवार्यता होती है। राष्ट्रों के वैश्विक समुदाय में राष्ट्रवाद का यही अर्थ होता है और इसका यही अर्थ होना चाहिए। इस्रायली विद्वान, येल तामिर ने इस विषय पर विस्तारपूर्वक विचार किया है। उनके अनुसार उदार राष्ट्रवाद के लिए ऐसी मन:स्थिति की आवश्यकता होती है जिसकी विशेषता अपने समूह के सदस्यों के साथ-साथ दूसरे समूहों के सदस्यों के प्रति सहिष्णु और विविधता के प्रति सम्मान की भावना हो। अत: यह 'परिभाषिक रूप से बहुकेन्द्रिक' होता है और यह 'मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता, व्यक्तियों का व्यक्तिगत स्वायत्ता के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक सन्निहितता की' संस्कृति की विशिष्टता को सराहती है।' दूसरी ओर, राष्ट्रवाद का वह स्वरूप जिसमें सांस्कृतिक प्रतिबद्धताओं को उसके केन्द्र में रखा जाता है, को राष्ट्रीयता का सबसे रूढ़िवादी और अनुदार स्वरूप माना जाता है। इससे असहिष्णुता और अपूर्ण देशभक्ति को बढ़ावा मिलता है।34

अनेकतावाद और धर्मनिरपेक्षवाद के लिए अनुसार राष्ट्रीयता के क्या निहितार्थ हैं अथवा हो सकते हैं? यह स्पष्ट है कि अनेकतावाद और धर्मनिरपेक्षतावाद दोनों को ही संकुचित किया जाएगा क्योंकि दोनों के संपोषण के लिए मतों और राज व्यवस्था का एक ऐसा परिवेश अपेक्षित होता हो जो असहिष्णुता का परिहार करता हो और उग्रवादी और अनुदार राष्ट्रवाद से स्वयं को दूर रखता हो, संविधान और उसकी उद्देशिका का शब्द और कृत्य में अनुपालन करता हो और यह सुनिश्चित करता हो कि जाति, पंथ, और वैचारिक सम्बद्धता की परवाह किए बिना नागरिकता ही भारतीयता का एकमात्र निर्धारक है।

अत: हमारे मिश्रित धर्म निरपेक्ष, लोकतंत्र में 'अन्य' कोई नहीं बल्कि 'हम' ही हैं। इस बात का उल्लंघन करना उसके मूलभूत मूल्यों के लिए क्षतिकारक होगा।
जय हिंद।


1 Rawls, John. A Theory of Justice (Harvard 2001) p 3-4.
2 Cited in Neera Chandoke: Contested Secessions (New Delhi 2012) p 44.
3 Al -Azmeh, Aziz. ‘Pluralism in Muslim Societies’ – Lecture delivered on January 29, 2005 at the India International Centre (IIC), New Delhi.
4 Jayal, Niraja Gopal. Citizenship And Its Discontent: an Indian history (New Delhi 2013) p 255. More recently, the author has observed that ‘While jus soli remains the governing principle of citizenship in India, citizenship law and jurisprudence have come to be manifestly inflected by elements of jus sanguinis’. – ‘Citizenship’ in The Oxford Handbook of the Indian Constitution (New Delhi 2016) p 179.
5 Khilnani, Sunil. The Idea of India (London 1997) p 175.
6 Taylor, Charles. ‘Democratic Exclusion (and Its Remedies?) in Rajeev Bhargava, A.K. Bagchi and R. Sundaram (ed): Multiculturalism, Liberalism and Democracy (New Delhi 2007) pp 139-163.
7 Tourne, Alain. What Is Democracy (Boulder, Colorado, 1997) p 190.
8 Bhargava, Rajeev(ed). Secularism and its Critics (New Delhi 1998). Akeel Bilgrami: ‘Secularism – Its Contents and Context’ – Economic & Political Weekly, vol xlvii No.4 January 28, 2012 pp 89-100. Also, Mohita Bhatia:‘Secularism and Secularisation: A Bibliographical Essay’ – EPW, vol xlviii, No 50, December 14, 2013 pp 103-110.
9 S.R.Bommai vs Union of India, (1994) 3 SCC (Jour) 1, March 11, 1994 para 252. Also, paras 153(viii), 176, 177, 304, 434(10).
10 Manohar Joshi v Nitin Bhaurao Patil 1996 AIR SC 796.
11 Tarkunde, V.M. ‘Supreme Court Judgment: a blow to secular democracy’ – January 19, 1996, published in PUCL Bulletin, February 1996.
12 Ghosh, S.K. ‘Charge of the cow brigade’- The Statesman (New Delhi) May 18, 2017. 13 Tejani, Shabnum: Indian Secularism – A Social and Intellectual History (New Delhi 2007), p 265.
14 Cossman, Brenda & Kapur, Ratna. Secularism’s Last Sigh? Hindutva and the (Mis) Rule of Law (New Delhi 1999) pp139-140.
15 Mehta, Pratap Bhanu. The Burden of Democracy (New Delhi 2003) pp 16-17.
16 Rasheeduddin Khan. Bewildered India: Identity, Pluralism, Discord (New Delhi 1995) p.295.
17 Oommen, T.K. Social Inclusion in Independent India: Dimensions and Approaches (New Delhi 2014) p 269.
18 Baxi, Upendra. ‘The Rule of Law in India’ – Sur, Rev.int direitos human. Vol 4, no 6 Sao Paulo 2007
19 Hasan, Zoya.Democracy and the Crisis of Inequality (New Delhi 20140 p 4.
20 Association for Democratic Reform (ADR), National Election Watch. The Law Commission of India indicated in March 2015 (Report No. 255, pp 80-82) that the winning candidate wins only 20-30% of the votes.
21 Mehta, Pratap Bhanu. Op cit p 161.
22 Shankar, B.L. & Rodrigues, Valerian. The Indian Parliament: A Democracy At Work (New Delhi 2011) p 336. The situation has worsened in recent years.
23 Kapur, Davish & Pratap Bhanu Mehta. ‘The Indian Parliament as an Instrument of Accountability’ –UN Research Institute for Social Development: Democracy, Governance and Human Rights Programme Paper No. 23, January 2006.
24 Atish Merlena, Prashant Bhushan & Reena Gupta: ‘Initiatives and Referendums -The Next Step in Indian Democracy’ in Rajeev Bhargava and Vipul Mudgal (ed): Claiming India from Below: Activism and democratic Transformation (New Delhi 2016) p 323.
25 Report of the Expert Group on Diversity Index submitted to the Ministry of Minority Affairs, Government of India, 2008, pp VII -VIII.
26 Padhy, Sanghamitra - ‘Secularism and Justice: A Review of Indian Supreme Court Judgments’ - Economic & Political Weekly, Vol 39, No. 46/47, November 20-26, 2004 pp 5027-5032
27 Austin, Granville. ‘The Supreme Court and the Struggle for the Custody of the Constitution’ in Supreme But Not Infallible: Essays in Honour of the Supreme Court of India (New Delhi 2000) p. 13.
28 Ansari, M. Hamid. ‘Cohesion, Fragility and the Challenge of Our Times’ – Indira Gandhi Memorial Lecture, The Asiatic Society, Kolkata, October 3, 2016.
29 Kaviraj, Sudipta. ‘Nationalism’ in The Oxford Companion to Politics in India (ed. Niraja Gopal Jayal & Pratap Bhanu Mehta. New Delhi 2013) p 325. 30 Tagore, Rabindranath. ‘Nationalism in India’ in Nationalism (New Delhi 2012) pp 85-116. Amartya Sen. The Argumentative Indian (New Delhi 2005) p 108. 31‘Use this law more selectively’ – Editorial in Hindustan Times, June 22, 2017.
32 Basu, Kaushik. ‘Resisting the moral retreat’ – Indian Express, June 22, 2017.
33 Bacevich, Andrew J. The New American Militarism: How Americans Are Seduced By War (New York 2005) p 224.
34 Tamir, Yael. Liberal Nationalism (Princeton 1993) pp 79, 83, 90, 95.