14 फरवरी, 2017 को आईआईसी में पांचवें के. सुब्रह्मण्यम व्याख्यान में भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री मो. हामिद अंसारी का भाषण

नई दिल्ली | फ़रवरी 14, 2017

सुरक्षा के घरेलू आयामों के संबंध में कुछ विचार

हमारे समय के एक महान व्यक्तित्व के बारे में विचार प्रकट करने के लिए बुलाया जाना मेरे लिए सौभाग्य की बात है जिनके बारे में यह सही ही कहा गया है कि वह चार दशकों से अधिक तक सरकार के भीतर या उससे बाहर राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी बहस पर हावी रहे हैं और उन्होंने इसके बारे में जागरूकता फैलाने में मदद की है।

केएस, जिस नाम से उन्हें सभी लोग जानते थे, पारंपरिक दृष्टि से राष्ट्रीय हित की पुरजोर वकालत करते थे और उन्होंने अपने लेखन और आईडीएसए के निदेशक के रूप में और बाद में कारगिल समीक्षा समिति के अध्यक्ष के रूप में और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड में अनेक वर्षों तक अपने कार्यों के माध्यम से इसकी सांस्थानिक व्यवस्था को आकार देने में मदद की।

सुब्रह्मण्यम की प्राथमिक चिंता राष्ट्रीय सुरक्षा थी और उनको एक "यथार्थवादी" कहे जाने पर भी उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती थी। उन्होंने अगस्त, 1997 के एक निबंध में राष्ट्रीय सुरक्षा की अपनी समझ को विस्तार से बताया जिसमें उन्होंने बाहरी और घरेलू खतरों के संबंध में "संभावित घटनाक्रम पर सोच-विचार करने और उनके बारे में पूर्वानुमान लगाने में कमी रहने" पर दु:ख जताया और 'नुकसान से बचने या उसे सीमित करने के लिए सक्रिय नीतियों' की वकालत की। उन्होंने एक विस्तृत पत्र आईडीएसए इन रेट्रोस्पेक्ट में इसे और विस्तार से बताया जिसमें भारत में विद्वानों से परामर्श करने की संस्कृति के अभाव पर दु:ख जताया, परमाणु मामले में भारत की नीति में परिवर्तन को स्वीकृति के साथ नोट किया और 'आतंकवाद एवं उभरते हुए अंतर्राष्ट्रीय शक्ति संतुलन तथा उसमें भारत की भूमिका' की गहन घरेलू चर्चा और नीति-निर्माताओं के बीच जागरुकता की जरूरत वाले मामलों के रूप में पहचान की।2

रणनीतिक नीति निर्माण पर्याप्त नहीं होने के बारे में सुब्रह्मण्यम की चिंता का इस विषय के जानकार अमरीकी विचारकों ने समर्थन किया था। 3

II

राष्ट्रीय सुरक्षा की संकल्पना किसी देश का राष्ट्रीय हित समझे जाने की बात से अपरिहार्य रूप से जुड़ी हुई है। राष्ट्रीय हित समय के साथ विकसित हुआ है और आज के अधिकतर विश्लेषक हंस मॉर्गेन्थाउ द्वारा "अन्य राष्ट्र-राज्यों द्वारा अतिक्रमण के विरुद्ध भौतिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण" के रूप में किए गए इसके वर्णन का समर्थन करेंगे। इसी के अनुक्रम में एक अन्य परिभाषा बैरी बुजान की है : 'सुरक्षा को खतरे से मुक्ति के प्रयास और राज्यों और समाजों द्वारा अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखने की उनकी क्षमता और परिवर्तन की ताकतों, जिन्हें वे प्रतिकूल पाते हैं, के विरुद्ध उनकी कारगर एकता के रूप में लिया जाता है। सुरक्षा का मुख्य बिंदु बचे रहना है, परंतु उसमें अस्तित्व की दशाओं के बारे में भी अनेक विशिष्ट चिंताएं तर्कसंगत रूप से शामिल हैं।

मॉर्गेन्थाउ के तीन अवयवों में से भौतिक अवयव परिभाषा की दृष्टि से सबसे सरल है। इसका आशय है बाहरी आक्रमण या तख्तापलट से राज्य का संरक्षण करना। यह जिम्मेवारी संपूर्ण इतिहास में राज्य के स्तंभों द्वारा धारण की गई है और इसका कारगर ढंग से निवर्हन करने के लिए व्यवस्थाओं को तदनुसार उपलब्ध आर्थिक और प्रौद्योगिकीय क्षमताओं के अनुसार सुचारू बनाया गया है ताकि अतिक्रमणकारियों को रोका जा सके और उन्हें इसकी उपयुक्त कीमत भी चुकानी पड़े।

भारत और भारतीय हितों के संरक्षण का अर्थ राज्यों के वैश्विक समुदाय में सक्रिय भागीदारी करना भी है। इसके लिए नियमों, मानकों और संस्थाओं को आकार देना और सुदृढ़ बनाना आवश्यक हो जाता है जो आगामी दशकों में शांति, सुरक्षा और सम्पन्नता की आधार होंगे। इनमें से सर्वप्रथम स्थान सुरक्षा को पारंपरिक और गैर-पारंपरिक खतरों का होगा।

वर्ष 2014-15 के लिए रक्षा मंत्रालय के वार्षिक प्रतिवेदन में सुरक्षा परिदृश्य और उसके सम्मुख आने वाली चुनौतियों का सार दिया गया है। इसे क्षेत्रीय और वैश्विक अनिवार्यताओं और चुनौतियों की जटिल परस्पर क्रिया के रूप में परिभाषित करते हुए, रणनीति और नीतियों के मामले में एक सुरक्षित, स्थायी, शांतिपूर्ण और समृद्ध पड़ोस बनाने पर ध्यान केन्द्रित किया गया है। इसके लिए प्रचालनात्मक सिद्धांत सामरिक स्वायत्तता और आत्मनिर्भरता के माध्यम से शक्ति संचयन करना है।

इस प्रतिवेदन में आतंकवाद, घुसपैठ और हमारे पश्चिम और उत्तर से उत्पन्न साम्प्रदायिक संघर्ष को गैर-पारंपरिक खतरों जैसे सामूहिक विनाश के अस्त्र (डब्ल्यूएमडी) की वृद्धि, नशीली दवाओं, मानव तस्करी आदि के कारण उत्पन्न हो रही चुनौतियों के साथ-साथ स्थिरता के लिए खतरे के रूप में बताया गया है। कतिपय देशों द्वारा आक्रमण और क्षमताओं के प्रदर्शन के साथ साइबर और अंतरिक्ष के क्षेत्रों में भी नई चुनौतियां उभर कर सामने आईं हैं।

इसके अलावा, हमें बहुआयामी आंतरिक सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ता हैं जिनमें वामपंथी उग्रवाद, जम्मू और कश्मीर में जारी अप्रत्यक्ष युद्ध, उत्तर-पूर्व में कुछ राज्यों में घुसपैठ और संगठित अपराध शामिल हैं।4

अन्य दो तत्व, अर्थात राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान, विचाराधीन समाज की मूल प्रकृति, उसके राज्य की संरचना और उसके आत्म-बोध से संबंधित है। आधुनिक भारत के अस्तित्व की वास्तविकता व्यापक विविधता बहुल समाज है जो संविधान की उद्देश्किा में प्रतिष्ठापित उद्देश्यों और आदर्शों की प्राप्ति के लिए समर्पित है। यह प्रत्येक अन्य नागरिक के साथ समता के संदर्भ में व्यक्ति को नागरिकता की आधारभूत इकाई की मान्यता पर आधारित है। अत:, यह नागरिकता के ऐसे स्वरूप की अभिलाषी है जो न तो संपूर्ण एकरूपता द्वारा सृजित सार्वभौमिकता पर आधारित है और न ही आत्मसमरूपता और संकीर्ण समुदायों की अनन्यता पर आधारित है। इसके लिए प्रचलनात्मक सिद्धांत 'राष्ट्रीय-सजातीय' न होकर 'राष्ट्रीय-नागरिक' है, यद्यपि आज एक समूह-विशेष का दष्टिकोण इसे परिवर्तित या संशोधित करके 'धार्मिक बाहुल्यवाद' पर आधारित 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के भारतीय रूपांतर को अपनाना चाहेगा। यह उदार राष्ट्रवाद के निवर्तमान दर्शन के विपरीत होगा जो कि 'संस्कृति की अनन्यता तथा मानवाधिकारों की सार्वभौमिकता, व्यक्तियों की सामाजिक और सांस्कृतिक सन्निहितता और उनकी व्यक्तिगत स्वायत्तता का अनुष्ठान करता है।'8

कुछ वर्ष पूर्व एक राजनैतिक पंडित ने इस दृष्टिकोण से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों के बारे में कहा था:

'कार्यात्मक राजनीति के शब्दार्थ विज्ञान में राष्ट्रीय एकता का अर्थ है, और जो कि होना भी चाहिए, वृहत राजनीतिक समुदाय का निर्माण करने वाले व्यक्तियों के अनेक भिन्न-भिन्न वर्गों की संबद्धता न कि मिश्रण, एकता न कि एकरूपता, सम्मिलन न कि विलय, समायोजन न कि विनाश, संयोजन न कि विघटन, एकता न कि विखण्डता....अत: यह स्वाभाविक है कि एकता विभिन्नताओं को एकरूपता में परिवर्तित करने की प्रक्रिया नहीं है अपितु विभिन्नताओं का सामंजस्य है जो एक ऐसी एकता में परिणत होती है जिसमें विविधताओं और समानताओं, दोनों का अनुरक्षण होता है'।9

III

गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए परंपरागत घरेलू खतरों को चार वर्गों में श्रेणीबद्ध किया है: (i) देश के भीतरी क्षेत्रों में आतंकवाद, (ii) जम्मू और कश्मीर में सीमा-पार से होने वाला आतंकवाद, (iii) उत्तर-पूर्वी राज्यों में आतंकवाद, और (iv) कतिपय राज्यों में वामपंथी उग्रवाद। इसका आंकलन है कि वर्ष 2014 में 'आतंकवाद, उग्रवाद और विद्रोह के विशेष संदर्भ में देश की आंतरिक सुरक्षा की स्थिति में पर्याप्त सुधार हुआ है।' साथ ही, इसने यह भी कहा है कि वामपंथी उग्रवाद अभी भी चिंता का विषय बना हुआ है; 'इसे दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए क्योंकि हिंसा की स्थिति में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव होता रहता है।'

नागरिक समाज अध्ययनों के अतिरिक्त, देश के 10 राज्यों को प्रभावित करने वाला वामपंथी उग्रवाद वर्ष 2008 में दो विस्तृत सरकारी प्रतिवेदनों का विषय रहा है। एक प्रतिवेदन प्रशासनिक सुधार आयोग का है और दूसरा प्रतिवेदन योजना आयोग का है। पहले प्रतिवेदन में वामपंथी उग्रवादी आंदोलन को 'आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा' बताया गया है जो कि मूलत: कृषि-संबंधी है और जिसे लोगों का समर्थन प्राप्त है और यह बेदखल और हाशिये पर रह रहे वर्गों को एकजुट करके विशेषत: वन और जनजातीय क्षेत्रों में मजबूत हो रहा है। दूसरे प्रतिवेदन का निष्कर्ष है कि समाज के हाशिये पर रह रहे वर्गों पर विकास के जो प्रतिमान थोप दिए गए हैं, उसमें गरीबों की कीमत पर ताकतवर वर्गों द्वारा असमान रूप से सारा लाभ हासिल कर लिया गया है और, विशेषत: जनजातियों के मामलों में यह उनके सामाजिक संगठन, सांस्कृतिक पहचान, और संसाधन आधार के विनाश के रूप में परिणत हुआ है और इससे अनेक विवाद उत्पन्न हो गए हैं और उनकी जातिगत एकजुटता कमजोर हुई है और यह सब मिलकर उन्हें शोषण का आसान शिकार बना देता है।

विरोध के इन आंदोलनों की विविधताओं का उल्लेख करते हुए योजना आयोग का विचार था कि 'इन आंदोलनों को सामान्यत: विद्रोह की संज्ञा देना, कानून और व्यवस्था की स्थिति को भंग करने वाला मानना वस्तुत: इन्हें बलपूर्वक दबाने का आधार बनाने से कुछ अधिक नहीं है।' इसने आगे कहा कि 'तनाव की इन स्थितियों को सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में देखने और जनता के मुद्दों - आजीविका का अधिकार, जीवन जीने का अधिकार तथा सम्मानजनक और प्रतिष्ठित अस्तित्व के अधिकार के ऐजेंडे पर वापस लौटने की आवश्यकता है। राज्य को स्वयं ही भारत के संविधान की उद्देशिका, मौलिक अधिकारों और नीति निदेशक सिद्धांतों में वर्णित लोकतांत्रिक अधिकारों और मानवाधिकारों तथा मानवीय उद्देश्यों के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए। राज्य को विधि के शासन का अनुपालन करना चाहिए। वास्तव में, राज्य के पास शासन का और कोई अन्य प्राधिकार नहीं है।'

गृह कार्य संबंधी स्थायी समिति ने वर्ष 2013-2014 की अनुदान मांगों के संबंध में अपने प्रतिवेदन में वामपंथी उग्रवाद को 'भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक सबसे बड़ा एकल खतरा' और देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने के लिए चुनौती के रूप में वर्णित किया है। इसने सिफारिश की है कि केन्द्रीय और राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विकास का लाभ वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचें और उन क्षेत्रों के युवाओं को रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध कराए जाएं। 13

9 दिसंबर, 2015 को राज्य सभा में एक अतारांकित प्रश्न के उत्तर में गृह मंत्रालय ने कहा है कि 'वर्ष 2011 से वामपंथी उग्रवाद से जुड़ी हिंसा में कमी आई है' और साथ ही यह भी बताया है कि 'केन्द्रीय सरकार वामपंथी उग्रवादी के विद्रोह से निपटने के लिए एक चार-सूत्रीय कार्यनीति का अनुसरण कर रही है - सुरक्षा संबंधी उपाय; विकास संबंधी हस्तक्षेप, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और पात्रताओं को सुनिश्चित करना और जनता की अनुभूतियों को समझना।'14

इस प्रकार आधिकारिक आकलनों में सुधार की स्थिति परिलक्षित होने और इस धारणा के बावजूद कि माओवादी आंदोलन में जड़ता आ गई है, उड़ीसा जैसे राज्य अब भी वामपंथी उग्रवाद को गंभीर चिंता का विषय मानते हैं और जानकार अध्येता वामपंथी उग्रवाद की चुनौती से निपटने में शीघ्र सफलता मिलने की संभावना के विषय में आगाह करते हुए कहते है: 'संभव है कि माओवादी चुनौती से निपटने में लगभग सात से दस साल का समय लग जाए।'16

आंतरिक सुरक्षा का एक अन्य पहलू जिस पर गृह मंत्रालय की रिपोर्ट में रोशनी नहीं डाली गई थी परंतु जो जनमानस के लिए अत्यंत अहम मुद्दा है, वह सामाजिक समरसता से संबंधित है। जाति, संप्रदाय अथवा अन्य सामजिक वर्गों में सामाजिक असामंजस्य की छिट-पुट घटनाओं से सामाजिक समरसता को खतरा उत्पन्न हो सकता है। संविधान की उद्देशिका में निर्दिष्ट बंधुता की अनिवार्यता और अनुच्छेद 51क(ड.) द्वारा प्रत्येक नागरिक के लिए निर्धारित कर्तव्यों को साकार करने में व्यक्ति अथवा समूह के स्तर पर विफलता इनका बुनियादी कारण रहा है। केवल बंधुता की भावना के माध्यम से ही सामाजिक चर्चा और व्यवहार का स्तर सहिष्णुता से आगे बढ़कर स्वीकार्यता तक पहुंच सकता है।

यह उल्लेख करना आवश्यक है कि सामाजिक संघर्ष के सभी नहीं तो अनेक मामले समय पर सुरक्षात्मक अथवा सुधारात्मक उपाय करने में राज्य की एजेंसियों की विफलता को भी दर्शाते हैं। 2016 के संबंध में एक आकलन पेश करते हुए, साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल ने टिप्पणी की है कि 'यद्यपि देश भर में और विचारधारा के स्तर पर आतंकवाद और उग्रवाद की तात्कालिक चुनौती में कमी आई है तथापि भारत में संघर्ष की संभावना अब भी अधिक है और सरकार की नीति और पक्षपातमूलक राजनीति से अक्सर स्थिति बिगड़ जाती है। 17

IV

कुछ वर्ष पहले समाजशास्त्री टी. के. उम्मेन ने सुरक्षा के एकल-आयामी, यथार्थवादी, राज्य-केंद्रित दृष्टिकोण के स्थान पर एक ऐसा व्यापक दृष्टिकोण अपनाने की मांग की थी जिसमें 'सुरक्षा तीन स्तंभों - राज्य, बाजार और नागरिक समाज का संयुक्त सरोकार बन सके।' उन्होंने तर्क दिया कि द्विभाजनीय संरचनाओं के बदले, निरंतरता इष्टतम होने की अवधारणा का विचार इसका केंद्र-बिंदु होना चाहिए। और चूंकि 'असुरक्षा की भावना स्वयं को जनसंहार, संस्कृति के संहार और पारिस्थितिकी को नष्ट करने की प्रवृति में अभिव्यक्त करती है। अत: इन बातों से मुक्त समाज को एक सुरक्षित समाज के रूप में अवधारित किया जा सकता है।18

किसी देश की राजनैतिक और सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा हेतु देश के भीतर उत्पन्न होने वाले संभावित और वास्तविक खतरों के बारे में जानना आवश्यक है। सुरक्षा के लिए ये आंतरिक खतरे परम्परागत अथवा अपरम्परागत हो सकते हैं। वर्तमान समय में, इन दोनों ही प्रकार के खतरों का दायरा विस्तृत हुआ है और आज अवधारणात्मक कार्यढांचा मानव सुरक्षा के संदर्भ में देखा जाता है। 10 सितम्बर, 2012 के संयुक्त राष्ट्र महासभा संकल्प 66/290 में यथापरिभाषित मानव सुरक्षा, देश की सुरक्षा का स्थान नहीं लेती है, बल्कि स्वतंत्रता और गरिमा के साथ-साथ गरीबी और निराशा से मुक्त जीवन जीने के नागरिकों के अधिकार को पुष्ट करती है।

विश्लेषण के लिए बृहत्तर प्रतिमान क्यों अनिवार्य हो गए हैं?

जब "हम भारत के लोगों" ने 26 नवम्बर, 1949 को स्वयं को संविधान अर्पित किया तो उन्होंने उद्देश्किा और मूल अधिकार, राज्य नीति के निर्देशक तत्व और मूल कर्तव्य संबंधी खंडों में उन लक्ष्यों का उल्लेख किया जिन्हें हासिल किया जाना था। ये उद्देश्य सुरक्षा के परंपरागत ढांचे से कहीं व्यापक हैं, हालांकि सुरक्षा का पारंपरिक ढांचा उन स्थितियों के निर्माण के लिए एक अपरिहार्य शर्त है जहां नागरिक अपने श्रम के वांछित परिणामों को प्राप्त करने के लिए प्रयास कर सकें।

स्वाधीनता प्राप्ति के सात दशक बाद भी कई वर्गों के लोगों में व्यापक अशांति, असंतोष और संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। क्षेत्रीय और सामाजिक असंतुलनों के कारण ऐसे खतरे उत्पन्न हुए हैं जो उग्रवाद, आतंकवाद, उपराष्ट्रीयतावाद और सांप्रदायिकवाद को जन्म व बढ़ावा देते रहे हैं। आर्थिक असमानताओं ने सामाजिक तनाव, शहरों में अशांति, ग्रामीण आंदोलन और युवाओं में निराशा को जन्म दिया है। वंचना, बेरोजगारी, गरीबी, भूख और अनाज की कमी, आवास की कमी, अत्यधिक भीड़भाड़ और मूलभूत सुविधाओं के स्तर में गिरावट जैसी समस्यओं के कारण क्रोध और अपराधों में वृद्धि हुई है। इनमें वृद्धि होने से समस्या बदतर होती जा रही है। भारत के 535 में से 201 जिले किसी न किसी रूप में हिंसा से प्रभावित हैं। परिणामस्वरूप, जनता में कई लोगों का व्यवस्था, कानून व्यवस्था कायम रखने और कानून का शासन लागू करने में कानून लागू करने वाली एजेंसियों की क्षमता और न्याय प्रदान करने की न्यायपालिका की क्षमता से विश्वास उठ रहा है।

योजना आयोग और नीति आयोग के अध्ययनों, भारत के सामाजिक विकास के प्रतिवदेनों, यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्टों और अन्य विश्वसनीय अध्ययनों से स्पष्ट है कि सुरक्षा संबंधी पारंपरिक चिंताओं का समाधान हो भी जाए तब भी व्यक्तिगत और सामुदायिक दोनों स्तरों पर मानव सुरक्षा के लिए बहुत कुछ किया जाना शेष रहेगा।

अशांत और उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में लोग स्वयं को उग्रवादियों और राज्य दोनों से असुरक्षित महसूस करते हैं। इस संबंध में सरकार की प्रतिक्रिया अधिकाधिक सुरक्षा बलों की तैनाती और परिवेश का ज्यादा से ज्यादा सैन्यकरण करना ही रहा है। समुदाय और समूह दोनों स्तरों पर केंद्रविरोधी प्रवृत्तियां और अलगाववाद की भावना बढ़ रही है। जनता को लगता है कि उसके हित के लिए सरकार कुछ नहीं कर रही है और सरकार के हित का जनता की हित से कोई लेना देना नहीं है। गंभीर रूप से अशांत क्षेत्रों में राज-काज की स्थिति बदतर होती जा रही है। विरोधाभासी बात यह है कि राज्य और समुदाय दोनों ही असुरक्षित हैं।

उसके अतिरिक्त, शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक वितरण एवं नागरिक सेवाएं चरमरा जाने की कगार पर हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में जीवन की गुणवत्ता में समृद्ध लोगों को छोड़कर बहुत कमी आई है और संपन्न तथा वंचित लोगों के बीच का अंतर और बढ़ गया है।

आंतरिक सुरक्षा का केन्द्र समाज है, और उसे ही रहना चाहिए। वैयक्तिक स्वतंत्रता एवं समाज की सुरक्षा के मुद्दे प्राय: दूसरे के विरूद्ध दिखाई देते हैं। आंतरिक सुरक्षा संबंधी मुद्दों के समाधान के लिए सर्वाधिक आवश्यक बात है लोगों एवं समाज और विधिसम्मत शासन जिसे कि दुर्भाग्य से राजनीति प्रेरित शासन द्वारा कमजोर किया गया है, दोनों पर ध्यान केंद्रित किया जाए। कुछ वर्षों पहले, एक संवैधानिक प्राधिकारी ने कहा था कि राज्य के तीनों अंगों विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के ढांचे को ढहाने वाले सरकारी कार्यकलापों के कारण विधिसम्मत शासन चारों तरफ से घिर गया है।21

अत:, आंतरिक सुरक्षा की इन नकारात्मक प्रवृत्तियों को राजनैतिक, सामाजिक-आर्थिक एवं सुरक्षा क्षेत्रों में सीधी कार्रवाई के द्वारा उलट दिए जाने की आवश्यकता है। विधिसम्मत शासन, राज्य की कार्रवाई की जवाबदेही तथा उन सिद्धान्तों पर ध्यान दिया जाना चाहिए, जिनके आधार पर भारतीय राज्य कार्य करता है। इसके लिए सुरक्षा प्रबंधन के प्रति हमारे दृष्टिकोण में तालमेल बिठाने की आवश्यकता होगी।
जय हिंद।


1Subrahmanyam, K. ‘Dimensions of National Security’ – Frontline, Volume 14, No.16, August 9-22, 1997.
2Subrahmanyam, K. ‘IDSA in Retrospect’ – Strategic Analysis, Volume 35, No.4, July 2011, pp 719-738.
3Cohen, Stephen P. and Dasgupta, Sunil. Arming Without Aiming: India’s Military Modernization (Washington 2010) p xii -xiii.
4Ministry of Defence, Government of India. Annual Report 2014-15 – Chapter 1, paragraphs 1.2, 1.18, 1.30, 1.31.
5Mahajan, Gurpreet. The Multicultural Path: Issues of Diversity and Discrimination in Democracy (New Delhi 2002) pp. 15, 17, 217-218.
6Jayal, Niraja Gopal. Citizenship and Its Discontents ( New Delhi 2013) p 255
7Bose, Sugata. ‘Lunch with BS’ – Business Standard, March 4, 2016. Interview by Anjali Puri
8Tamir, Yael. Liberal Nationalism (Princeton 1993) p 79.
9Rasheeduddin Khan. Bewildered India – Identity, Pluralism, Discord (New Delhi 1995) p.295
10Ministry of Home Affairs, Government of India. Annual Report 2014-2015 p. 8
11‘Second Administrative Reforms Commission, 7th Report, February 2008, pp 17-19.
12Development Challenges in Extremist Affected Areas’ - Report of the Expert Group to the Planning Commission, April 2008., pp 29-30 and 83.
13Rajya Sabha. Standing Committee on Home Affairs – 163rd Report on Demand for Grants 2013 – 2014, 25.04.2013, paras 3.6.13-17.
14Rajya Sabha Unstarred Question No. 1163. Earlier, Starred Question No.18 answered on July 22, 2015 gave some details of the financial packages offered to LW Extremists under the ‘Surrender-cum-Rehabilitation Scheme. The Standing Committee on Home Affairs, in its report on the Demand for Grants of MHA for 2015-16, presented to the Rajya Sabha on 23.04.2015, had noted (in paras 2.17 – 2.19) the course of action undertaken by the Government ‘in terms of maintaining internal security scenario in the country.’
15The Economic Times, January 8, 2016, quoting Chief Minister Naveen Patnaik.
16Ramana, P.V. ‘India’s Maoist Movement: Trends and Security Implications’ in Robin Jeffrey, Ronojoy Sen and Pratima Singh (ed) More Than Maoism: Politics, policies and insurgencies in South Asia (New Delhi 2012) p. 338.
17South Asia Terrorism Portal. ‘India Assessment – 2016.’ - erwww.satp.org
18Oommen, T.K. Understanding Security: A New Perspective (New Delhi 2006) pp 7-12, 136, 138.
19SATP, quoting MHA 2013 reports
20David H. Bayley, quoted in Prakash Singh: The Naxalite Movement in India (New Delhi 2007) p 251.
21Vahanvati, Goolam.E. ‘Rule of Law: Siege Within’ in Constitutionalism Human Right & the Rule of Law – Essays in honour of Soli J. Sorabjee (New Delhi 2005) pp 165-173.