30 नवम्बर, 2016 को नई दिल्ली में माननीय भारत के उपराष्ट्रपति श्री मो. हामिद अंसारी द्वारा दिया गया 22वां न्यायमूर्ति सुनन्दा भण्डारे स्मृति व्याख्यान

नई दिल्ली | नवम्बर 30, 2016

पितृसत्ता का समापन?

यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे ऐसे विशिष्ट व्यक्तियों की मण्डली में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है जो पिछले वर्षों के दौरान वार्षिक सुनन्दा भण्डारे व्याख्यान दे चुके हैं।

न्यायाधीश सुनन्दा भण्डारे को स्त्री-पुरुष समानता के संबंध में लम्बे समय से किए जा रहे प्रयास और उस दिशा में अब तक अपूर्ण तलाश के अग्रदूत के रूप में स्मरण किया जाता है। 21वीं सदी के दूसरे दशक में यह बात अजीब लग सकती है, क्योंकि भारत का संविधान और स्त्री-पुरुष समानता संबंधी इसके उपबंध 1950 से ही लागू हैं और इन्हें राष्ट्रीय विधानों और उन बहुत सारे अंतर्राष्ट्रीय संधियों के माध्यम से परिपूरित किया गया है जिन्हें भारत और अधिकतर अन्य राष्ट्रों द्वारा स्वीकार किया गया है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के स्त्री-पुरुष असमानता सूचकांक में इसकी निराशाजनक स्थिति परिलक्षित होती है जिसमें वर्ष 2014 में कुल 188 देशों में भारत 127वें स्थान पर था।

मैं आप सभी सम्मानित श्रोताओं को यह बताना चाहूंगा कि इस स्पष्ट विडम्बना के पीछे जो कारण हैं उनका संबध विधान और नियमों के क्षेत्र में कम और मानव मूल्यों एवं व्यवहार से संबंधित सामाजिक धारणाओं में अंतर्निहित अघोषित या आंशिक रूप से घोषित प्रमुख रीति रिवाज़ों के साथ कहीं अधिक है, क्योंकि इसका विकास अनेक सहस्त्राब्दियों के दौरान हुआ है। इसका संबंध पितृसत्ता की अवधारणा से है जिसे गेर्डा लर्नर ने अपने मौलिक अध्ययन में परिभाषित करते हुए कहा है कि 'यह परिवार में महिलाओं और बच्चों पर पुरुषों की प्रत्यक्ष प्रधानता को संस्थागत रूप दिया जाना तथा सामान्य रूप में समाज में महिलाओं पर पुरुष प्रधानता का विस्तार किया जाना है। इसका तात्पर्य है कि समाज की सभी महत्वपूर्ण संस्थाओं में सत्ता पुरुषों के पास होती है और महिलाओं को इस सत्ता तक नहीं पहुंचने दिया जाता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि महिलाओं को बिल्कुल भी शक्ति प्राप्त नहीं है या वे अधिकारों, प्रभाव या संसाधनों से पूर्णत: वंचित हैं।'1

उनका तर्क है कि यह लिखित इतिहास से भी पहले की बात है और इसकी शुरुआत ईसा से तीन सहस्त्राब्दि पूर्व हुई थी।

इस विषय पर सिल्विया वाल्बी द्वारा किए गए एक अन्य अध्ययन में पितृसत्ता को इस तरह से परिभाषित किया गया है कि 'यह सामाजिक संरचना और परिपाटियों की एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें महिलाओं पर पुरुषों का प्रभुत्व होता है और वे उनका दमन और शोषण करते हैं। वे आगे कहती हैं कि इसके परिणामस्वरूप जो विचारधारा बनती है उसमें 'लिंग के आधार पर व्यक्तिपरकता के भिन्न-भिन्न स्वरूपों' का जन्म होता है।’

अन्य लोगों ने पितृसत्ता को परिभाषित करते हुए कहा है कि यह 'ऐसी विशिष्ट मनोवैज्ञानिक-समाजशास्त्रीय संपूर्णता है जो सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संरचना में हमेशा दिखाई देती है।’3

दूसरे शब्दों में, यह लम्बे समय से चली आ रही ऐसी व्यवस्था है जिसमें बहुत से लोग शामिल हो जाते हैं और वे उनमें से अधिकतर- अनजाने ही इस व्यवस्था में भागीदार बन जाते हैं। यह प्रक्रिया के साथ-साथ उत्पाद भी है।

समकालीन बहसों में एक अस्पष्ट विरोधी मत के रूप में पितृसत्ता को परिभाषित करते हुए कहा जाता है कि यह 'एक ऐसी आलंकारिक युक्ति है जो आधी मानव जाति अर्थात् पुरुषों पर सामूहिक अपराधबोध की भावना को थोपना आसान बनाकर स्त्रीवादी विचारधारा को संबल प्रदान करती है।’4

हमारे अपने देश में, प्राचीनतम समय, जबसे संबंधित लिखित ग्रंथ उपलब्ध हैं, से ही पितृसत्ता एक जीवंत वास्तविकता रही है। एक अध्ययन में वैदिक और वैदिकोत्तर काल में इस स्थिति का सार प्रस्तुत करते हुए कहा गया है:

‘वैदिक युग में, महिलाएं अपने भाइयों के बराबर थी ----- यही स्थिति वैदिक युग के अंतिम दिनों और महाकाव्य काल और यहां तक कि बौद्धों के धर्मवैधानिक साहित्य की रचना किए जाने के समय तक भी बनी रही। परंतु उसके पश्चात्, अनुवर्ती काल के असामयिक जन आन्दोलनों तथा राजभक्ति के दुष्प्रभावों के साथ-साथ उसकी असामाजिक प्रवृत्तियों के कारण एक प्रतिक्रिया हुई जिसने सामाजिक अस्तित्व या दाम्पत्य जीवन की शांति और आनन्द की नींव को लगभग हिला ही दिया था -------

'इस प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप महिलाओं की आजादी और इससे उत्पन्न परिणामों की बुराइयों का सतत रूप से राग अलापा जाने लगा। महिलाओं को बौद्धिक क्षमता की दृष्टि से स्वाभाविक रूप से हीन माना जाने लगा और यह भी माना जाने लगा कि वे किसी भी बुराई की ओर सहजता से झुक सकती है। अत: उन्हें संरक्षण में रखने के लिए कानून बनाए गए और उन्होंने अपने बहुत से अधिकार खो दिए।’5

इसका दृष्टांत देने वाली एक पुस्तक है कौटिल्य की अर्थशास्त्र, जिसमें कतिपय कानूनी मामलों में स्त्री की हैसियत दास अथवा बंधुआ मजदूर के बराबर मानी गई है। इस विद्वान ने इसका आकलन इस रूप में किया है कि 'इस प्रकार समग्र तस्वीर इस तरह की है कि महिलाओं को मातहत की भूमिका में रखा जाता था परंतु यह सुनिश्चित करने के लिए उनको पर्याप्त संरक्षण दिया जाता था कि इसके कारण उनका पूरी तरह से शोषण न हो। इन रक्षोपायों ने व्यवहार में कितना कुछ किया होगा इसका केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है। इसकी संभावना है कि सदियां गुजर जाने के बाद अर्थशास्त्र में महिलाओं को दी गई कानूनी संरक्षण की गारंटी में क्रमिक क्षरण के परिणामस्वरूप उन्हें मनुस्मृति जैसी उत्तरकालीन संहिताओं में निम्न दर्जा दिया जाने लगा। आप में से बहुत से श्रोताओं को इसका ब्यौरा अच्छी तरह से पता होगा। विभिन्न युगों में उन्हें परिष्कृत करने अथवा उनकी अनुकूल व्याख्या करने के प्रयास किए गए हैं। एक समकालीन लेखक ने कुछ उदारतापूर्वक अपनी राय देते हुए कहा है कि मनु ने महिलाओं का जो निरूपण किया है उसे गरिमापूर्ण नहीं कहा जा सकता : कोई वास्तव में यह नहीं कह सकता कि मनु पूर्णत: महिलाओं के विरुद्ध थे। वह केवल समकालीन समाज की प्रबल प्रवृत्तियों के सामने झुक गए और संभवत: उनका विरोध नहीं कर सके।'’ 7

इस प्रक्रिया में, जान-बूझकर या अनजाने, जिस बात की अनदेखी हुई वह थी उस सामाजिक ढांचे की समग्रता जिसमें ये निर्देश दिए गए थे। यह एकतरफा और जाति आधारित और आज भी कमोबेश तीव्रता के साथ उसी रूप में बना हुआ है। 20वीं सदी में इसकी प्रतिक्रिया अंबेडकर द्वारा 1927 में मनुस्मृति की पुस्तक को सार्वजनिक रूप से जलाए जाने के प्रतीक के रूप में हुई।

प्राचीन पाण्डुलिपि और परिपाटी सिक्के का एक पहलू है, ज्यादा गंभीर और व्यापक है अवचेतन मन में बसी हुई पितृसत्तात्मक सोच, एक ऐसी सोच जिससे प्राय: रोजमर्रा के जीवन में सामना होता है और जिसकी अभिव्यक्ति शब्दों और भावों के माध्यम से एक व्यक्ति की शब्दावली और हमारे देश के अधिकांश भागों में सामाजिक परिपाटियों में होती है। शब्दावली पर प्रभाव के कुछ दृष्टांतों का कमला भसीन ने दो दशकों से अधिक समय पूर्व अपने निबन्ध में उल्लेख किया था। अन्य भाषाओं में भी इसी तरह की भावाभिव्यक्ति मौजूद हैं।

क्या हाल के वर्षों में हमारे समाज के बड़े भागों में इस स्थिति में कोई मूलभूत और गुणात्मक परिवर्तन हुआ है? एक हाल के आकलन से पता चलता है कि :

‘भारत के अधिकांश भागों में पितृसत्तात्मक समाजों के पूर्वाग्रह और कट्टरता ने लड़कों के लिए एक अनिवार्य वरीयता और लड़कियों के विरुद्ध भेदभाव का रूप ले लिया है। उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या, दहेज, दहेज के लिए दुल्हन को जलाया जाना और सती जैसी कुरीतियों को भी जन्म दिया है जिसके चलते लड़कियों के लिए पोषण, स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा और रोजगार की उपेक्षा की जाती है। महिलाओं के पास निर्णय लेने की सीमित स्वायत्तता होने के कारण उनके काम को सामाजिक रूप से भी कम महत्व दिया जाता है। जाति, वर्ग और लिंग के बंधनों के कारण स्थिति और भी बदतर हो गई है। सामाजिक निर्माण के कार्य के बावजूद पितृसत्तात्मक संस्कृति जिसे देश के प्रमुख धर्मों द्वारा बढ़ावा दिया गया है, लिंग असमानता को बनाए रखने में अपना शिकंजा कसे हुई है। प्रचलित पितृसत्तात्मक व्यवस्था महिलाओं के लिए न्याय को प्राप्त करने के वैकल्पिक दृष्टिकोणों की चर्चा करने पर वैचारिक रोक लगाती है'’9

II

आज के भारत में इस स्थिति का और अधिक पूर्ण आकलन हाल के सरकारी दस्तावेजों में प्रदर्शित स्थिति को ध्यान में रखते हुए शुरु किए जाने की जरूरत है। मई, 2013 में भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने भारत राष्ट्रपति द्वारा गठित राज्यपालों की समिति की सिफारिश के आधार पर महिलाओं की स्थिति के संबंध में एक उच्च-स्तरीय समिति गठित की थी। समिति का 1008 पृष्ठों का प्रतिवेदन जो तीन भागों में है, जून, 2015 में प्रस्तुत किया गया। इसके निष्कर्षों में निम्नलिखित बिन्दुओं को उजागर किया गया है:

  • 2015 में महिलाओं के लिए सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य पुरातन और नवीन का जटिल मिश्रण है। औद्योगीकरण, वैश्वीकरण, शहरीकरण और आधुनिकीकरण से महिलाओं के लिए कुछ सकारात्मक और कुछ जटिल परिवर्तन आये हैं। प्रवास, लिंग अनुपात में कमी और पर्यावरण प्रदूषण के कारण महिलाओं की स्थिति और कमजोर हुई है।
  • भारत में महिलाओं की यह विरोधाभासी स्थिति चिंताजनक है। एक ओर जहां उनकी देवियों के रूप में पूजा की जाती है, वही दूसरी ओर उन्हें दहेज के लिए जलाया भी जाता है। समाज में लड़कों की चाहत ज्यादा है। लड़कियों को अनचाहा बोझ समझा जाता है; वे चुपचाप पीड़ा सहती रहती हैं और उन्हें दुर्व्यवहार, हिंसा, बलात्कार और बाल विवाह जैसी कुरीतियों का शिकार होना पड़ता है। जब कभी वे अपनी चुप्पी तोड़ती है तो उसके भयंकर परिणाम सामने आते हैं। भेदभावपूर्ण प्रथाएं जैसे कि लिंग आधारित लिंग चयन, बाल विवाह, दहेज, झूठी शान के लिए मारा जाना और सामाजिक दृष्टि से उन्हें प्रताड़ित किया जाना समाज में उनकी कमजोर स्थिति के द्योतक हैं।
  • सरकार ने इन विरोधाभासों को माना है और नीतियों, विधान और कार्यक्रमों के जरिये उन्हें दूर करने का प्रयास किया है। इन उपायों के मिले जुले परिणाम मिल हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रीति रिवाजों के कारण कानूनी बदलावों को लागू किए जाने में विरोध का सामना करना पड़ा है।
  • यद्यपि सरकार के लगभग 30 विभागों में महिला-विशिष्ट और महिला हितैषी आवंटन किए जाते हैं जेकिन ये सभी आवंटन कुल बजट का महज 5.8 प्रतिशत हिस्सा ही हैं।
  • यदि श्रमिक बल की भागीदारी की बात की जाए तो 2015 में इस संबंध में भारत में विश्व की सर्वाधिक लिंग असमानता पायी गई। केवल 25 प्रतिशत महिलाएं ही कामकाजी हैं, आधे प्रतिशत से भी कम महिलाएं काम की तलाश कर रही हैं। गांवों और शहरों में कार्य अवसरों में 'अनौपचारिककरण' और 'नियमित श्रमिकों की अल्पकालिक पुनर्नियुक्ति' के मामले बढ़ रहे हैं। पिछले दशक के दौरान कार्य स्थल पर महिलाओं की संख्या में नियमित रूप से कमी आयी है। आईएमएफ के एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि यदि महिला कामगारों की संख्या पुरुष कामगारों के समान हो जाए तो भारत की जीडीपी में 27 प्रतिशत की वृद्धि होगी।10

प्रतिवेदन में समुक्ति की गई है कि इन बाधाओं के बावजूद आगे बढ़ने वाली महिलाओं की संख्या बहुत कम है और इसके विश्लेषण से पता चलता है कि 'परिवर्तन अत्यधिक धीमा है और स्पष्ट निर्देश के अभाव में अनिश्चित और निराशाजनक बना हुआ है और यह कि 'व्यापक कार्यक्रम में अलग-अलग जाति, वर्ग, आयु और जीवन अवस्था/स्थितियों और अन्य विविधताओं के आधार पर महिलाओं की जरूरतों और आकांक्षाओं की पहचान करने और उन्हें पूरा करने की क्षमता होनी चाहिए। ये कार्यक्रम टुकड़ों मं होने के बजाय संपूर्ण होने चाहिए और इनमें यौन और प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य सहित स्वास्थ्य संबंधी समग्र जरूरतों, साक्षरता, शिक्षा, सुरक्षा और हिंसा रहित कार्यस्थल, व्यक्तिगत और राजनैतिक विकास हेतु आकांक्षाओं की पूर्ति और आर्थिक सशक्तीकरण के उपाय शामिल होने चाहिए।

प्रतिवेदन में यह स्वीकार किया गया है कि 'अन्य बातों के साथ-साथ परिवार, जाति, समुदाय और धर्म के माध्यम से पितृसत्तात्मक मूल्यों और विचारों को निरंतर सुदृढ़ किया जाता है और वैध बनाया जाता है।'11

प्रतिवेदन में उल्लेख किया गया है कि प्रगतिशील विधायी पहलों के साथ-साथ उन संस्थाओं की संस्कृति में आनुषंगिक परिवर्तन नहीं किए जाते हैं जिन पर इन पहलों को कार्यान्वित करने का उत्तरदायित्व है और यह कि सशक्तीकरण की प्रक्रिया उन संस्थाओं तक पहुंचनी चाहिए जो व्यापक परिवर्तन की कुंजी धारण करते हैं जिनमें धर्म, परिवार, विवाह, शैक्षणिक संस्थाएं, कानून और व्यवस्था न्यायपालिका तथा मीडिया शामिल है।'’12

प्रतिवेदन में इसका उल्लेख तो है परन्तु इसमें ऐसी कार्य स्थिति के मूल कारणों का विशिष्ट रूप से समाधान नहीं किया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि इसमें 'संस्थाओं की संस्कृति' स्थापित करने तथा विस्तृत समुदाय के विभिन्न भागों में संस्कृति और प्रथाओं पर आधारित सामाजिक परम्पराओं का सूत्रपात करने के तरीकों के बारे में कोई सुझाव नहीं दिया गया है।

3 मार्च, 2016 को राज्य सभा में इस प्रतिवेदन पर पूछे गए प्रश्न का उत्तर महिला एवं बाल विकास मंत्री द्वारा दिया गया था। इसमें सामान्य शीर्षों के अंतर्गत सिफारिशों का सार प्रस्तुत किया गया था किन्तु इसमें घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा संबंधी विद्यमान कानून तथा हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 2005 की कतिपय विशेषताओं पर ध्यान आकर्षित किए जाने के अलावा सरकार द्वारा प्रस्तावित कार्यप्रणाली का कोई संकेत नहीं दिया गया था।13

इस वर्ष दो महीने बाद, मई में, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने "राष्ट्रीय महिला नीति: सशक्तीकरण हेतु सुस्पष्ट दृष्टिकोण" के मसौदे को अपनी वेबसाइट पर डाल दिया। यह इस बात पर बल देता है कि तेजी से बदलते हुए परिदृश्य में 'महिलाओं के बारे में ऐसी दृढ सांस्कृतिक एवं सामाजिक धारणा रखने वाले समाज में महिलाओं के लिए जटिल सामाजिक-आर्थिक तथा सांस्कृतिक चुनौतियां सामने आ रही हैं कि देश में इस समय अनुभव की जा रही अनवरत विकास प्रगति में महिलाओं को अंतत: एक समान सहभागी के रूप में सम्मान देने के लिए अभी भी काफी कुछ किया जाना बाकी है। इसका उद्देश्य 'एक प्रभावी रूपरेखा' तथा अनुकूल सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक तथा राजनैतिक वातावरण तैयार करना है जिससे महिलाएं अपने पूर्ण सामर्थ्य को वास्तविक रूप प्रदान करने के लिए कानूनन तथा हकीकत में मूल अधिकारों का उपयोग कर सके। ’

इस दस्तावेज में पितृतन्त्र शब्द का उल्लेख नहीं किया गया है।

21 जुलाई, 2016 को राज्य सभा में एक अन्य प्रश्न के दिए गए उत्तर में मंत्री ने कहा कि वियुक्त/तलाकशुदा/विधवा महिलाओं की स्थिति के बारे में उच्च स्तरीय समिति की 'कतिपय सिफारिशों' को प्रारूप राष्ट्रीय नीतियों 'उचित रूप से शामिल किया गया है'। 2 फरवरी तथा 18 नवम्बर, 2016 को लोक सभा में भी राष्ट्रीय महिला सशक्तीकरण नीति, 2002 के संबंध में दो प्रश्नों के उत्तर दिए गए थे। इसमें 2001 से अधिनियमित विधानों का ब्योरा दिया गया था और दूसरे प्रश्न के उत्तर में यह उल्लेख किया गया था कि आज काफी संख्या में महिलाएं कानून का सहारा लेकर अपनी पसंद के अनुसार जीवन यापन कर रही हैं क्योंकि सशक्तीकरण पूर्णत: पसंद से संबंधित है।15

प्रारूप राष्ट्रीय नीति के अनुसार नीति संबंधी रूपरेखा में स्वास्थ्य और पोषण, शिक्षा, गरीबी उपशमन, उन्नत अक्षमता, कौशल विकास के प्रमुख क्षेत्रों के संघटक तथा कृषि उद्योग, श्रम, सेवा क्षेत्रों, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, शासन व्यवस्था तथा निर्णय लेने में उद्यमिता शामिल होगी। यह महिलाओं के प्रति होने वाली सभी प्रकार की हिंसाओं का भी समाधान करेगा तथा इसके अलावा आवास तथा शरणस्थल पेयजल तथा स्वच्छता, मीडिया, खेलकूल, सामाजिक सुरक्षा, अवसंरचना, पर्यावरण तथा जलवायु परिवर्तन से संबंधित अनुकूल वातावरण तैयार करेगा। इसे महिलाओं के लिए उचित तथा समावेशी एवं न्यायसंगत हक सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार व्यक्तिगत तथा प्रथागत रूप से समीक्षा करनी होगी। इसके अलावा राष्ट्रीय, राज्य तथा स्थानीय सरकार के स्तर पर और सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों, कारपोरेटों, व्यापारों, मजदूर संघों, गैर सरकारी संगठनों तथा समुदाय आधारित संगठनों में कार्यान्वयन के लिए विशिष्ट, पूरा किए जाने योग्य तथा प्रभावी रणनीतियां अपनानी होंगी। अन्तर-मंत्रालयी समिति द्वारा एक अन्तर-मंत्रालयी कार्य योजना विकसित की जाएगी और उसकी निगरानी की जाएगी।.16

अस्पष्ट कारणों से प्रारूप राष्ट्रीय नीति में पाम राजपूत रिपोर्ट को विशिष्ट रूप से उल्लिखित नहीं किया गया है, इसके कारण स्पष्ट नहीं हैं। अत:, पाठक इन दोनों के समिलन या अन्यथा क्षेत्रों के बारे में अंधेरे में है। फिर भी कहा जा सकता है कि प्रारूप राष्ट्रीय नीति में कुछ हद तक पाम राजपूत रिपोर्ट का अंतिम पैरा प्रतिबिंबित होता है जिसमें आग्रह किया गया है कि सभी पणधारक स्त्री-पुरूष भेदभाव को समाप्त करते हुए समानता के साथ इस व्यापक सशक्तीकरण का माहौल तैयार करने के कार्य को पूर्णत: गंभीरता और प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ाएं।’17

III

अत: यह स्थिति है, जो हाल के आधिकारिक दस्तावेजों में परिलक्षित होती है। पहले में पितृतंत्र की मौजूदगी तथा उसकी व्यापकता का संदर्भ है, तो दूसरा इसकी ओर गोल-मोल तरीके से इंगित करता है। दोनों ही विभिन्न प्रकार के सुधारों का सुझाव देते हैं जो कि क्रांतिकारी के बजाए वृद्धिकारी हैं, बाध्य करने के बजाए समझाने की आवश्यकता वाली राय और व्यवहार पर आधारित हैं जिससे कि महिलाओं को बड़े पैमाने पर सार्वजनिक जीवन और अर्थव्यवस्था, विशेषत: ऐसे क्षेत्रों में जिनमें उन्हें अभी तक अपात्र समझा जाता था, के एक सक्रिय घटक के रूप में शामिल करके बदलते हए वातावरण में स्वीकार किया जा सके।

बताए गए परिवर्तन गुणात्मक होने के बजाए संख्यात्मक हैं और वे उन सामाजिक वातावरण और प्रथाओं को अर्थपूर्ण ढंग से व्याख्या नहीं करते जिनसे पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रह पोषित होते हैं। सशक्तीकरण पर जोर, वृद्धिकारी दृष्टिकोण समानता के बजाए साम्यता का द्योतक है। अत: यह सार अपरिहार्य है कि चाहे पितृसत्ता समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी हो परन्तु अभी भी इसका परिणाम सामने आना बाकी है।

अत: उपलब्ध साक्ष्य से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि पितृतंत्र अभी समाप्त नहीं हुआ है और यह कि सरकार तथा समाज द्वारा किए जा रहे वर्तमान उपाय का मुख्य उद्देश्य वास्तविक समानता के बजाए विभिन्न स्तर की साम्यता लाना है।

इस प्रकार, पितृसत्तात्मक व्यवस्था से समानता की ओर बढ़ने की चुनौती अनिवार्य है। इसके बिना स्त्री-पुरूष समानता को बनाए रखने पर प्रश्न चिह्न लगा रहेगा।
जय हिन्द।


1Lerner, Gerda. The Creation of Patriarchy (New York 1986) p 239.
2Walby, Sylvia. Theorising Patriarchy (Oxford 1990) p 20.
3Sharabi, Hisham. Neopatriarcy: A Theory of Distorted Change in Arab Society (New York 1988) p 17.
4http://www.urbandictionary.com/define.php?term=patriarchy
5Bandyopadhyaya, Narayan Chandra. Development of Hindu Polity and Political Theories (New Delhi 1980) pp 413-14.
6Kautailya. The Arthashastra – ed. L.N. Rangarajan (New Delhi 1992) pp 70-71.
7Suinanda Shastri: ‘Position of Women in Manusmrti’ in Indian Culture: Religion and Ethics (Bhartiya Vidya Mandir, Bikaner 2006) p 383.
8Bhasin, Kamla. What Is Patriarchy? (Kali for Women, New Delhi 1993) pp 3-5.
9Jacob, K.S. ‘Sex ratio, patriarchy and ethics’ – The Hindu, August 21, 2011.
10Report of the High Level Committee on the Status of Women in India (Government of India, Ministry of Women and Child Development (New Delhi, June 2015) Volume I, pp xviii- xxi.
11Ibid – Volume I, p 58.
12Ibid – Volume III, pp 950-952.
13Rajya Sabha Unstarred Question No.957 by Dr. Chandan Mitra.
14Rajya Sabha Unstarred Question No. 539 by Shri Husain Dalwai.
15Lok Sabha Unstarred Questions No 533 of 26.02.2016 and No.535 of 18.11.2016.
16National Policy for Women 2016 (Draft) , Paragraphs I.1.7-10, 3, 4, 5, II, III, IV, V, VI, VII, 6 and 7.
17Op Cit, volume III, p 952.